Bihar Election 2025 Exit Poll: पहले इम्तिहान में फेल हुए प्रशांत किशोर, जन सुराज पार्टी को एग्जिट पोल्स का झटका

बिहार चुनाव 2025 के एग्जिट पोल्स में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पहली बार चुनावी मैदान में उतरी पार्टी कोई खास असर नहीं दिखा पाई। सभी सर्वे ने प्रशांत किशोर के खाली हाथ रहने की आशंका जताई है। अगर नतीजे ऐसे ही रहे, तो जन सुराज की एंट्री उम्मीद से कमजोर साबित होगी।

Rishabh Shukla
अपडेटेड11 Nov 2025, 09:25 PM IST
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर(HT)

बिहार में पदयात्राओं के जरिए राजनीति में बदलाव का सपना दिखाने वाले प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को एग्जिट पोल्स में अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरी यह पार्टी बिहार की सियासी फिजाओं में चर्चा में जरूर रही, लेकिन आंकड़ों के लिहाज से प्रभावशाली प्रदर्शन करती नहीं दिख रही है। सभी एग्जिट पोल्स में इस बात की आशंका जताई गई है कि जन सुराज को एक भी सीट नहीं मिलेगी। यानी अधिकतर सर्वे ने जन सुराज का खाता खुलने पर आशंका जताई है। हालांकि पीपल्स पल्स ने जन सुराज को 0 से 5 सीटें मिलने की उम्मीद जताई है। जेवीसी पोल ने जन सुराज को 0 से 1 सीट जबकि अन्य सभी ने 0 से 2 सीटें मिलने की उम्मीद की है।

तो क्या खाली हाथ रह जाएंगे पीके?

बिहार की राजनीति को बदलने का वादा करके पहली बार बिहार के सियासी रण में उतरने वाली जन सुराज पार्टी को एग्जिट पोल्स में निराशा हाथ लगती दिख रही है। सर्वे एजेंसी पीपल्स इनसाइट के सर्वे में जन सुराज को 0-2 सीटें, मैट्रिज के एग्जिट पोल में 0 से 2 सीटें, पीपुल्स प्लस के सर्वे में जन सुराज को 0 से 5 सीटें, जबकि दैनिक भास्कर के एग्जिट पोल में जन सुराज को एक भी सीटें नहीं मिलने का अनुमान लगाया गया है। यानी बिहार विधानसभा में जन सुराज पार्टी का एक भी विधायक नहीं पहुंच पाएगा। वहीं अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो, पीपल्स पल्स के सर्वे में 7 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने प्रशांत किशोर की नई जन सुराज पार्टी को अपना समर्थन दिया है, मैट्रिज के सर्वे में 6 फीसदी महिला मतदाताओं ने जन सुराज पार्टी को वोट दिया, जबकि मैट्रिज के सर्वे में जन सुराज पार्टी को 6 प्रतिशत पुरुषों के वोट मिलने का भी अनुमान लगाया गया है।

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एग्जिट पोल्स ने उठाए पीके की रणनीति पर सवाल

बीते 3 बरस से प्रशांत किशोर ने अपनी पहचान एक चुनावी रणनीतिकार से जननेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। जन सुराज यात्रा के जरिए उन्होंने गांव-गांव तक पहुंच बनाई, स्थानीय मुद्दे उठाए और जातीय राजनीति से ऊपर उठने की बात कही। लेकिन, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक ढांचा और स्थानीय कैंडिडेट नेटवर्क की कमी पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। उनके अभियान का नैरेटिव मजबूत था, लेकिन जमीन पर वोट में तब्दील नहीं हो सका। यानी पीके बिहार के सियासी रुख को भापने में नाकाम रहे।

ग्रामीणों में चर्चा, लेकिन असर सीमित

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्रामीण मतदाताओं और युवाओं में पीके की अपील थी लेकिन वह वोट में नहीं तब्दील हुई। बहुत से मतदाता उन्हें भविष्य का विकल्प तो मानते हैं, लेकिन फिलहाल सत्ता की दौड़ में नहीं समझते। नतीजन एग्जिट पोल्स में अपनी छाप छोड़ने में पीके की पार्टी जन सुराज नाकाम साबित हुई। हालांकि राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीके के लिए यह शुरुआत का इम्तिहान था। अगर पार्टी को सीमित सीटें भी मिलती हैं, तो वह आगे की रणनीति के लिए एक मंच तैयार कर सकती है।

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14 नवंबर के बाद PK के सामने असली चुनौती

एग्जिट पोल्स के नतीजे भले निराशाजनक हों, लेकिन पीके के लिए यह राजनीतिक यात्रा की पहली परीक्षा है। असली चुनौती अब 14 नवंबर के बाद शुरू होगी, जब नतीजों के बाद उन्हें यह तय करना होगा कि वे बिहार की सियासत में विचार-विकल्प की आवाज और ताकत बने रहेंगे या नहीं।

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