Bihar Chunav Result 2025: कहां चूका महागठबंधन? वो गलतियां जिनसे बिगड़ी बाजी, महागठबंधन की रणनीतिक भूलों का कड़वा सच

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के शुरुआती रुझानों में एनडीए को भारी बढ़त मिली है, जबकि महागठबंधन 30 से नीचे सिमटता दिख रहा है। मोदी–नीतीश की संयुक्त अपील, एनडीए की एकजुट रणनीति और मजबूत बूथ मैनेजमेंट ने वोटरों को आकर्षित किया। दूसरी ओर, महागठबंधन के अव्यवस्थित कैंपेन ने उसे नुकसान पहुंचाया।

Rishabh Shukla
अपडेटेड14 Nov 2025, 04:30 PM IST
महागठबंधन की बुरी हार
महागठबंधन की बुरी हार (HT)

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के शुरुआती रुझानों ने राजनीतिक समीकरणों में बड़ा उलटफेर दर्ज किया है। दोपहर 3:30 बजे तक एनडीए 208 सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाए हुए है, जबकि महागठबंधन मात्र 30 सीटों पर सिमटता दिख रहा है। इस चुनाव में जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि स्थिरता के लिए नीतीश, नेतृत्व के लिए मोदी। दूसरी ओर, विपक्षी महागठबंधन की उम्मीदों को करारा झटका लगा है। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी किसी सीट पर बढ़त नहीं ले सकी, जिसने सबसे ज्यादा सभी को चौंकाया है। अब सवाल है कि महागठबंधन इतने बड़े अंतर से क्यों पिछड़ा? इसके पांच प्रमुख कारण चुनावी नतीजों में साफ दिखाई देते हैं।

हवा-हवाई वादों पर जनता ने नहीं किया भरोसा

तेजस्वी यादव ने सरकारी नौकरी, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा जैसे बड़े-बड़े वादे किए लेकिन उनका फंडिंग मॉडल या ठोस समय-सीमा सामने नहीं रख पाए। करोड़ों नौकरियां और तेजस्वी प्रण जैसे नारों ने शुरुआत में उत्साह जरूर पैदा किया लेकिन ब्लूप्रिंट न आने से विश्वसनीयता कमजोर हुई। दूसरी ओर एनडीए ने इन वादों को अवास्तविक बता कर माहौल बनाया और इसमें सफल भी रहे।

सीट बंटवारे में देरी और भरोसे की कमी

राजद, कांग्रेस और वाम दलों के बीच अंदरूनी अविश्वास शुरू से ही दिखा। सीट शेयरिंग के मतभेद, देर से घोषणा और एकजुट कैंपेन की कमी ने जमीनी स्तर पर महागठबंधन को नुकसान पहुंचाया। चुनावी पोस्टर से लेकर जनसभाओं तक, तीनों दलों में तालमेल न दिखना वोट बिखराव का बड़ा कारण बना।

जंगलराज और मुस्लिमपरस्त नैरेटिव का प्रभाव

महागठबंधन का मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस और कई बयानों ने विपक्ष को संवेदनशील नैरेटिव थमाया। BJP ने जंगलराज, कानून-व्यवस्था और मुस्लिम तुष्टिकरण को आक्रामक रूप से उठाया। कई स्थानों पर यादव वोट भी खिसक गए। राजद उम्मीदवारों के उग्र कट्टा बयान ने नुकसान पहुंचाया, जिससे पुरानी छवि फिर उभर आई।

यादव-केंद्रित टिकट वितरण

144 सीटों में 52 यादव उम्मीदवार उतारकर राजद ने जातीय समीकरण को अत्यधिक तवज्जो दी। इससे गैर-यादव ओबीसी, अत्यंत पिछड़े और सवर्ण समुदाय महागठबंधन से दूर हुए। बीजेपी ने इसे यादव राज कहा और शहरी तथा मध्यम वर्ग में इसका असर दिखा।

NDA की एकजुटता, मोदी फैक्टर और नीतीश पर भरोसा

एनडीए ने संगठित चेहरे के साथ चुनाव लड़ा। मोदी की रैलियां निर्णायक साबित हुईं और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया कि अगले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे। इससे मतदाताओं को स्थिरता और भरोसे का संकेत मिला। महागठबंधन की तुलना में एनडीए का बूथ मैनेजमेंट भी अधिक प्रभावी रहा। कुल मिलाकर बिहार के मतदाताओं ने इस बार अनुभव, स्थिरता और भरोसे को तरजीह दी है। एनडीए की बढ़त महागठबंधन की रणनीतिक गलतियों का भी परिणाम है। यह चुनाव बताता है कि बिहार में राजनीतिक संदेश और प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना नेतृत्व और गठबंधन की विश्वसनीयता।

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