नीतीश कुमार ने क्या सच में बदली बिहार की 'बीमारू' छवि? आंकड़ों में देखें लालू-राबड़ी राज से अब तक का पूरा सफर

Bihar GDP: लालू-राबड़ी के दौर में बिहार की इकोनॉमी धीमी गति से जूझ रही थी। नीतीश कुमार के आने के बाद ग्रोथ तो तेज हुई, पर चुनौतियां बनी रहीं। अब एक बार फिर बिहार देश की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गया है।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड12 Oct 2025, 10:56 AM IST
राबड़ी, लालू और नीतीश (फाइल फोटो)
राबड़ी, लालू और नीतीश (फाइल फोटो)(Mint)

एक समय था जब बिहार की पहचान 'बीमारू' राज्य के तौर पर होती थी। हालांकि, पिछले दो दशकों में राज्य ने आर्थिक मोर्चे पर लंबी छलांग लगाई है। यह सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण और आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि राज्य की ग्रोथ वास्तविक है, लेकिन इसके रास्ते में मुश्किलें भी कम नहीं हैं। आइए समझते हैं कि लालू-राबड़ी के दौर से लेकर नीतीश कुमार के शासनकाल तक बिहार की इकॉनमी कैसे बदली है।

लालू-राबड़ी का जंगल राज: जब थम गई थी बिहार की ग्रोथ

1990 से 2005 तक का दौर बिहार के लिए आर्थिक रूप से काफी मुश्किल भरा था। इस दौरान लालू प्रसाद यादव और फिर उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रहीं। फाइनैंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस 15 साल के दौर में राज्य की जीडीपी ग्रोथ रेट बेहद धीमी पड़ गई थी। इंडस्ट्री और इन्फ्रास्ट्रक्चर के सेक्टर में कोई खास तरक्की नहीं हुई, जिससे बिहार देश के बाकी राज्यों से पिछड़ता चला गया। खराब गवर्नेंस और निवेश की कमी के चलते इसे 'बीमारू' राज्य कहा जाने लगा। भारत की कुल जीडीपी में बिहार की हिस्सेदारी जो 1990-91 में करीब 4.5% थी, वह 2000 के दशक की शुरुआत तक घटकर सिर्फ 2.8% रह गई।

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प्रति व्यक्ति आय में भारी गिरावट

फाइनैंशियल एक्सप्रेस ने आंकड़ों के हवाले से कहा है कि इस दौरान सिर्फ राज्य की इकॉनमी नहीं, बल्कि आम आदमी की कमाई पर भी बुरा असर पड़ा। 1990-91 में बिहार में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का लगभग 45% थी। लेकिन 2000 के दशक के अंत तक यह घटकर सिर्फ 25% रह गई। यानी, अगर देश में एक व्यक्ति औसतन 100 रुपये कमा रहा था, तो बिहार का व्यक्ति सिर्फ 25 रुपये कमा पा रहा था। साल 2000 में झारखंड के अलग हो जाने से बिहार के ज्यादातर खनिज और औद्योगिक संसाधन भी चले गए, जिससे हालात और खराब हो गए।

नीतीश कुमार का शासन: पटरी पर लौटी इकॉनमी

फाइनैंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि 2005 में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद बिहार की इकॉनमी ने रफ्तार पकड़ी। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 2004-05 से 2010-11 के बीच राज्य की ग्रोथ रेट लगभग 11% तक पहुंच गई, जबकि इससे पहले के पांच सालों (राबड़ी देवी के शासन में) यह सिर्फ 3.5% थी। 2004-05 में राज्य की GSDP करीब 75,608 करोड़ रुपये थी, जो 2009-10 में बढ़कर 1,72,138 करोड़ रुपये हो गई। इसी दौरान प्रति व्यक्ति आय भी 8,528 रुपये से बढ़कर 17,959 रुपये हो गई। यह बढ़ोतरी तो हुई, पर तब भी यह राष्ट्रीय औसत का सिर्फ एक-तिहाई ही था।

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उतार-चढ़ाव भरा रहा सफर

नीतीश कुमार के शुरुआती कार्यकाल में बिहार ने कुछ सालों में 13% से 17% तक की शानदार ग्रोथ दर्ज की। लेकिन 2015-16 में विकास दर अचानक गिरकर 7.6% पर आ गई। इसके बाद कोरोना महामारी ने इकोनॉमी को और झटका दिया और 2020-21 में ग्रोथ रेट 2.5% निगेटिव में चली गई। 2020-21 में बिहार की प्रति व्यक्ति आय 55,055 रुपये थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 86,659 रुपये था। इससे पता चलता है कि तेज ग्रोथ के बावजूद बिहार और देश के बाकी हिस्सों के बीच आय का अंतर बना हुआ है।

क्या बड़ी इकोनॉमी बनेगा बिहार?

तमाम चुनौतियों के बावजूद, बिहार आज भारत के सबसे तेजी से बढ़ने वाले राज्यों में शामिल है। उद्योग संगठन CII की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अगर राज्य अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करे तो 2046-47 तक बिहार की अर्थव्यवस्था 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, युवा आबादी और सहायक नीतियों के कारण बिहार निवेशकों के लिए एक आकर्षक जगह बन रहा है। 2023-24 में, बिहार की GSDP 8.54 लाख करोड़ रुपये रही, जिसमें 14.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो कि 12% की राष्ट्रीय विकास दर से कहीं ज्यादा है।

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