
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों से पहले आए एग्जिट पोल ने सूबे की सियासत को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। लगभग सभी प्रमुख सर्वे एजेंसियों मैटेराइ, पीपुल्स पल्स, सी-मत और एबीपी-सी वोटर ने अपने अनुमानों में एनडीए को स्पष्ट बढ़त दी है। आंकड़े भले ही अलग-अलग हों लेकिन संदेश एक ही है कि मोदी-नीतीश की जोड़ी एक बार फिर बिहार की राजनीति में असरदार साबित होती दिख रही है। एग्जिट पोल्स के मुताबिक बिहार ने तेजस्वी यादव को नकार दिया और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी बेअसर साबित हुई।
सर्वे एजेंसी Matrize के एग्जिट पोल में एनडीए को 147-167, महागठबंधन को 70-90, जन सुराज को 0 से 2 सीटें मिलने का अनुमान है। पीपुल्स प्लस के सर्वे में एनडीए को 133-159 सीटें तो महागठबंधन को 75-101 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं जन सुराज को 0 से 5 सीटें मिलने का अनुमान है। दैनिक भास्कर के एग्जिट पोल में एनडीए को 145-160 सीटें, जबकि महागठबंधन को 73-91 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं जन सुराज को एक भी सीटें नहीं मिलने का अनुमान है। इन अनुमानों ने एनडीए खेमे का मनोबल बढ़ा दिया है, वहीं महागठबंधन में बेचैनी साफ झलकने लगी है और प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में अनफिट लग रहे हैं।
एग्जिट पोल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि एनडीए की बढ़त सिर्फ शहरी क्षेत्रों में नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी दिख रही है। सीमांचल, मिथिलांचल, पटना-नालंदा और चंपारण बेल्ट में बीजेपी-जेडीयू की पकड़ मजबूत मानी जा रही है। डबल इंजन सरकार का नारा एक बार फिर गांव-गांव गूंज रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि ने मिलकर एक भरोसेमंद समीकरण बनाया है।
एग्जिट पोल के मुताबिक महागठबंधन कई क्षेत्रों में संघर्षरत दिख रहा है। तेजस्वी यादव की रैलियों में भीड़ जरूर दिखी, लेकिन उसे वोट में तब्दील कर पाना मुश्किल साबित हुआ। कांग्रेस और वाम दलों की उपस्थिति अपेक्षित असर नहीं डाल सकी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरजेडी अपने पारंपरिक वोट बैंक पर तो टिकी रही लेकिन महिलाओं, युवाओं और विकास-आधारित मतदाताओं को अपने पक्ष में नहीं ला सकी। इसके अलावा NDA की ओर से प्रधानमंत्री मोदी की आक्रामक चुनावी रणनीति और नीतीश कुमार की स्थिर प्रशासनिक छवि ने विपक्ष के मुद्दों को पीछे धकेल दिया।
एग्जिट पोल के मुताबिक बिहार के सियासी गलियारों में नरेंद्र-नीतीश की जोड़ी फिर से हिट साबित हुई। लोग मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व और भरोसे का प्रतीक मानते हैं, जबकि नीतीश को स्थिरता और गंभीर प्रशासक के रूप में देखते हैं। यही तालमेल इस बार भी काम करता दिख रहा है। जहां मोदी की अपील ने बड़ी भीड़ को आकर्षित किया, वहीं नीतीश के विकास कार्यों ने सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य ने जमीनी स्तर पर वोटरों को जोड़ने का काम किया है।
एग्जिट पोल्स भले ही अंतिम नतीजे न हों, लेकिन उनके रुझानों ने बिहार की सियासत में हलचल जरूर पैदा कर दी है। NDA खेमे में उत्साह और आत्मविश्वास साफ झलक रहा है। बीजेपी और जेडीयू के नेता इन आंकड़ों को जनता के भरोसे का प्रमाण मान रहे हैं, वहीं महागठबंधन के भीतर अब रणनीति पर गहन मंथन शुरू हो गया है। अगर एग्जिट पोल्स के रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह साफ संदेश होगा कि बिहार ने तेजस्वी यादव के बदलाव के नारे के बजाय नीतीश कुमार के सुशासन और मोदी सरकार के विकास मॉडल को फिर से चुना है। अब निगाहें 14 नवंबर की मतगणना पर हैं, जब यह तय होगा कि एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणी कितनी सटीक साबित होती है।
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