
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 64.66 प्रतिशत मतदान के साथ राज्य ने इतिहास रच दिया है। यह अब तक का सबसे अधिक वोटिंग प्रतिशत है, जिसने साल 2000 के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ी हुई वोटिंग सत्ता विरोधी संकेत भी हो सकती है, क्योंकि महिला और युवा मतदाताओं की भागीदारी इस बार अभूतपूर्व रही। एनडीए जहां सुशासन और विकास पर भरोसा जता रहा है, वहीं महागठबंधन बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर जनता से बदलाव की अपील कर रहा है। 11 नवंबर के दूसरे चरण से पहले सियासी तापमान अपने चरम पर है।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार में मतदाताओं की भागीदारी का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। वर्ष 2000 में 62.57 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो उस समय तक का रिकॉर्ड था। इसके बाद 2005 में दो बार हुए चुनावों में फरवरी में 46.5% और अक्टूबर में 45.85% मतदान दर्ज हुआ। 2010 में यह बढ़कर 52.73%, 2015 में 56.91% और 2020 में 57.29% तक पहुंचा। अब यानी की 2025 में 64.66% मतदान के साथ बिहार ने न केवल पुराना रिकॉर्ड तोड़ा है, बल्कि मतदाता जागरूकता की नई परिभाषा गढ़ दी है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह उछाल महज उत्साह नहीं है। वोटिंग प्रतिशत में उछाल एक साइलेंट पॉलिटिकल करंट का संकेत है। गांवों और कस्बों में महिलाओं की लंबी कतारें, युवाओं की सक्रियता और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर हुई बहस यह दर्शाती है कि मतदाता अब जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर अपने भविष्य को ध्यान में रखकर वोट दे रहे हैं।
बिहार का इतिहास भी यही बताता है कि सूबे में जब भी मतदान प्रतिशत में उछाल आया है, सत्ता परिवर्तन की संभावना बढ़ जाती है। 2015 में रिकॉर्ड वोटिंग के बाद महागठबंधन सत्ता में आया था, जबकि 2020 में थोड़ा कम मतदान NDA के पक्ष में गया था। ऐसे में 2025 का यह रिकॉर्ड वोटिंग आंकड़ा राजनीतिक हलकों में नए समीकरणों की आहट दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार का यह चुनाव सिस्टम पर विश्वास बनाम बदलाव की चाह की लड़ाई के बीच है। NDA अपनी विकास योजनाओं और सुशासन मॉडल पर जनता का भरोसा तलाश रहा है, जबकि महागठबंधन बेरोजगारी, पलायन और महंगाई को मुद्दा बनाकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहा है। इन सबके बीच जन सुराज पार्टी की बढ़ती सक्रियता भी इस बार समीकरण बिगाड़ सकती है, क्योंकि पीके की राजनीति पारंपरिक वोट बैंकों में सेंध लगाती दिख रही है।
पहले चरण में महागठबंधन के सीएम फेस तेजस्वी यादव, बिहार के दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा, मंगल पांडेय, मदन सैनी, नितिन नबीन, श्रवण कुमार सहित 15 मंत्रियों और महागठबंधन से वीणा देवी, भाई वीरेंद्र सिंह, रेणु कुशवाहा, ओसामा शहाब, खेसारी लाल यादव, अवधेश राय शामिल हैं। इसके अलावा तेज प्रताप यादव, आईपी गुप्ता, शिवदीप लांडे, आनंद मिश्रा, वीके रवि, जयप्रकाश सिंह, आरके मिश्रा, अनंत सिंह समेत 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दूसरा चरण बिहार की सियासत का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। पहले चरण में बढ़े हुए मतदान प्रतिशत ने सत्ता विरोधी लहर की संभावनाओं को बल दिया है। यदि यह रुझान दूसरे चरण में भी जारी रहा, तो नतीजे सत्ता समीकरणों को गहराई से बदल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 का यह चुनाव बिहार के राजनीतिक नैरेटिव को फिर से परिभाषित करने वाला चुनाव बन सकता है।