बिहार विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी हार ने कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। अब पार्टी को अपने नेताओं को एकजुट रखने, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सहयोगी दलों से सीटों पर समझौता करने और बिहार में अपनी खोई ताकत वापस पाने जैसी चुनौतियों का सामना करना होगा। इस चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 6 सीटें जीत पाई, जो 2010 के बाद सबसे कम है।
कथित वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर लगातार आक्रामक रहने वाली कांग्रेस ने बिहार के नतीजों पर अभी तक आधिकारिक बयान नहीं दिया है। लेकिन पार्टी के कई नेताओं ने निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NDA की जीत के बाद भाजपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि पार्टी के भीतर बड़ा विभाजन हो सकता है।
पिछले साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर वापसी के संकेत दिए थे। लेकिन इसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में लगातार हार ने उसकी उम्मीदों को कमजोर कर दिया। बिहार में कभी कांग्रेस बहुत मजबूत थी, लेकिन पिछले 40 सालों में उसकी स्थिति लगातार खराब होती गई।
बिहार चुनाव से कुछ सप्ताह पहले राहुल गांधी ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की थी। यह यात्रा जिन जिलों से गुजरी, वहां भी महागठबंधन को अच्छा प्रदर्शन नहीं मिला। इससे पता चलता है कि यात्रा का कोई खास असर नहीं हुआ।
17 अगस्त को सासाराम (रोहतास) से शुरू हुई यह यात्रा वोट चोरी और मतदाता सूची में गड़बड़ी के खिलाफ थी। यह रोहतास, औरंगाबाद, गया, नवादा, शेखपुरा, नालंदा, लखीसराय, मुंगेर, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, भोजपुर और कुछ अन्य क्षेत्रों से होकर गुजरी।
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