
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान पूरा हो चुका है और इस बार मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इन आंकड़ों से ज्यादा मतदाताओं की चुप्पी दिलचस्प है, क्योंकि यह तय कर पाना मुश्किल है कि वोट प्रतिशत में यह उछाल सत्तारूढ़ NDA के पक्ष में है या उसके खिलाफ। इन सबके बीच राजनीतिक गलियारों में अब सवाल एक ही है, क्या नीतीश कुमार और भाजपा की जोड़ी 160 सीटों का सपना पूरा कर पाएगी या बिहार एक बार फिर राजनीतिक करवट लेने को तैयार है?
NDA ने 243 सीटों में दो-तिहाई यानी 160 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। आज के मतदान के बाद NDA के शीर्ष नेता अपनी स्थिति अच्छी मान रहे हैं, लेकिन असल में जमीनी संकेत इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। 2020 में एनडीए को महागठबंधन पर केवल 15 सीटों की बढ़त मिली थी। अबकी बार बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और नीतीश सरकार की थकान जैसे मुद्दे जनता के बीच गूंजते हुए दिखे। नीतीश कुमार के सुशासन वाले पुराने ब्रांड में अब वैसी चमक नहीं दिखती।
इस बार बिहार के सियासी मैदान में एक नया समीकरण प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी है। प्रशांत किशोर ने सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर खुद को गंभीर खिलाड़ी के रूप में पेश किया है। पीके का फोकस भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और साफ राजनीति के मुद्दों पर है। पटना, बेगूसराय, दरभंगा जैसे इलाकों में उनकी सभाओं में जुटी भीड़ ने सियासी समीकरणों को हिला दिया है। विश्लेषक मान रहे हैं कि पीके का वोट शेयर कटिंग फैक्टर बन सकता है, जो एनडीए और महागठबंधन दोनों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाएगा।
बिहार का चुनाव जातीय संतुलन से तय होता है और एनडीए ने पिछड़ों और सवर्णों को बराबर प्रतिनिधित्व देकर इसे बारीकी से साधने की कोशिश की है। दूसरी ओर महागठबंधन यादव-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा कर रही है। साथ ही सवर्ण और दलित समुदायों में भी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। महिलाएं इस बार निर्णायक भूमिका में हैं। 2020 में महिला वोटर एनडीए की रीढ़ साबित हुई थीं। इस बार एनडीए ने 35 महिला उम्मीदवार उतारी हैं, जबकि तेजस्वी यादव ने जीविका दीदियों को 30,000 रुपए की सहायता देने का वादा कर सीधा संदेश दिया है कि वे महिला वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश करेंगे।
एनडीए का गणित बाहर से भले मजबूत दिखता हो, लेकिन भीतर दरारें साफ हैं। बीजेपी और जेडीयू को 101-101 सीटें मिलने से चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) को दी गई 29 सीटों पर असंतोष उभर आया है। बीजेपी के लिए भी यह आसान नहीं कि 2024 लोकसभा चुनाव में मिली 68 विधानसभा क्षेत्रों की बढ़त को बरकरार रखे, क्योंकि कई जगह स्थानीय समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।
2010 में नीतीश कुमार की लहर थी और एनडीए को 206 सीटें मिलीं, जिनमें 115 पर जेडीयू और 91 बीजेपी जीती थी। 2015 में नीतीश ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया और 178 सीटें जीत लीं, जिसमें आरजेडी को 80, जेडीयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली। 2020 के चुनाव में 75 सीटें जीतकर आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सरकार बना ली। तीनों चुनावों में एक पैटर्न दिखता है कि बिहार की जनता हर बार सत्ता को झटका देती है और यह चुनाव उसी चक्र का अगला पड़ाव लगता है।
इस बार पहले चरण में मतदान प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हुई है। राजनीतिक विश्लेषक इसे चुपचाप बदलाव का संकेत मान रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की लंबी कतारें और युवाओं की सक्रियता इस बात की गवाही देती हैं कि मतदाता इस बार सोच-समझकर वोट दे रहे हैं। अक्सर बिहार में जब मतदान दर बढ़ती है, तो सत्ता-विरोधी लहर को बल मिलता है।
बेरोजगारी और नौकरी की कमी इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है। एनडीए ने एक करोड़ नौकरियों का वादा किया है, लेकिन युवाओं में भरोसा कमजोर दिख रहा है। सोशल मीडिया पर चल रहे रुझान बताते हैं कि इस बार युवा विकास की भाषा में जवाब मांग रहे हैं। नारे या जातीय समीकरण अब उतने प्रभावी नहीं जितने पहले हुआ करते थे।
पहले चरण की 121 सीटों पर मतदान पूरा हो चुका है। दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को होगा और परिणाम 14 नवंबर को घोषित होंगे। अगर एनडीए 122 सीटों से आगे जाता है तो नीतीश कुमार आठवीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन अगर वोटिंग पैटर्न में थोड़ा भी झुकाव विपक्ष की ओर हुआ, तो 160 पार का नारा भी लोकसभा के समय दिए गए 400 पार की तरह सिर्फ एक राजनीतिक बयान बनकर रह जाएगा। कुल मिलाकर बिहार का पहला चरण यह संकेत दे चुका है कि मतदाता इस बार पहले से ज्यादा सजग हैं। अगर वोट प्रतिशत की यह बढ़ोत्तरी नाराजगी है, तो बिहार में बदलाव ने दस्तक दे दी है।
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