
मोकामा में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या ने बिहार की राजनीति को नई दिशा दे दी है। धानुक और यादव का गठजोड़ धीरे-धीरे बाढ़, लखीसराय और सूर्यगढ़ा तक फैल चुका है। इस जातीय ध्रुवीकरण ने NDA के लिए चुनावी गणित को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अनंत सिंह की गिरफ्तारी से तत्कालिक नुकसान कम हुआ, परंतु राजनीतिक असर गहराता जा रहा है। बैकवर्ड-फॉरवर्ड की यह गोलबंदी अब सिर्फ मोकामा तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि मध्य बिहार के कई सीटों पर निर्णायक असर डालने की स्थिति में है। आने वाले दिनों में यह गठजोड़ चुनावी नतीजों की दिशा तय कर सकता है।
मोकामा विधानसभा की राजनीति में जन सुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या ने अप्रत्याशित मोड़ ला दिया है। यह हत्या न सिर्फ स्थानीय जनभावनाओं को झकझोर रही है बल्कि पूरे दक्षिण-मगध से लेकर मध्य बिहार तक बैकवर्ड-फॉरवर्ड की गोलबंदी को फिर से परिभाषित कर रही है। एनडीए ने त्वरित कार्रवाई कर अनंत सिंह की गिरफ्तारी के जरिए डैमेज कंट्रोल की कोशिश जरूर की है, मगर मोकामा की मिट्टी से उठी यह जातीय लहर अब रुकती नहीं दिख रही।
मोकामा से शुरू हुआ धानुक-यादव समीकरण अब बाढ़, लखीसराय और सूर्यगढ़ा तक असर डाल रहा है। बाढ़ में भाजपा उम्मीदवार डॉ. सियाराम सिंह को राजद के लल्लू मुखिया से कड़ी चुनौती मिल रही है, कारण है यादव-धानुक का संगठित वोट ट्रांसफर। लखीसराय में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का मुकाबला कांग्रेस के अमरेश अनीश से है, मगर जातीय समीकरणों के फेर में यह सीट अब सुरक्षित नहीं रही है। सूर्यगढ़ा में तो मुकाबला त्रिकोणीय बन गया है; जदयू, राजद और निर्दलीय के बीच ध्रुवीकरण तेज है।
दुलारचंद यादव की हत्या का असर अब बरबीघा, शेखपुरा, हिलसा, वारिसलीगंज जैसे इलाकों तक महसूस किया जा रहा है। एनडीए के रणनीतिकारों ने नुकसान को थामने के लिए धानुक समाज के नेताओं को मैदान में उतारा है लेकिन स्थानीय स्तर पर जातीय एकजुटता गहराती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब यह चुनाव पारंपरिक समीकरणों की सीमाओं को तोड़ चुका है। यह सिर्फ उम्मीदवारों या दलों की जंग नहीं रह गई है, यह समाज के भीतर उपेक्षा और अस्तित्व की भावना से उपजा संघर्ष बन गया है और यही भावनात्मक लहर कई सीटों पर अप्रत्याशित नतीजे देने की भूमिका तैयार कर रही है। कुल मिलाकर बैकवर्ड-फॉरवर्ड का यह ध्रुवीकरण चुनावी नतीजों की दिशा तय कर सकता है। यह सिर्फ दलों की जंग नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और अस्तित्व की राजनीति बन चुका है, जिसने बिहार की सियासत को एक बार फिर जातीय मोड़ पर ला खड़ा किया है।
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