
बिहार की सियासत भारतीय लोकतंत्र की सबसे जीवंत मिसाल रही है। यहां हर चुनाव ने सत्ता, समाज और सोच के नए अध्याय लिखे हैं। 1952 से लेकर 2025 तक हुए कुल 18 विधानसभा चुनावों में हर बार जनता ने लोकतंत्र की जड़ों को गहराई दी। 1952 में जब पहला चुनाव हुआ, तब वोटिंग प्रतिशत मात्र 42.06% था। सात दशकों बाद 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 64.05% तक पहुंच गया, यह आंकड़ा बिहार की राजनीतिक चेतना का विकास है। 1950-60 के दशक में जहां चुनाव कई चरणों में हफ्तों तक चलते थे, वहीं अब तकनीकी दक्षता और प्रशासनिक सुधारों के कारण दो चरणों में मतदान पूरा हो रहा है। शुरुआती दौर में राजनीति जातीय पहचान और करिश्माई नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1990 के दशक में लालू यादव के सामाजिक न्याय के नारे ने राजनीति की दिशा तय की, तो 2005 के बाद नीतीश कुमार ने सुशासन और विकास की राजनीति को केंद्र में लाकर बिहार को नई पहचान दी। 2015 में महागठबंधन की एकजुटता ने भाजपा को चुनौती दी, लेकिन 2017 में नीतीश कुमार के फिर से एनडीए में लौटने से सियासी समीकरण बदले। 2020 में कोविड काल में भी बिहार ने लोकतंत्र को मजबूती दी, जब तीन चरणों के चुनाव में रिकॉर्ड मतदान दर्ज हुआ। इस बार 2025 में बढ़ा हुआ मतदान युवाओं की सक्रियता, महिलाओं की भागीदारी और सत्ता-विरोधी रुझान दोनों का संकेत देता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव पिछले दो दशकों के शासन और जनअपेक्षाओं का मूल्यांकन है।
1952 में जब बिहार में पहला विधानसभा चुनाव हुआ, तब मतदान प्रक्रिया 21 दिनों तक चली, 4 जनवरी से 24 जनवरी तक। 1957 में यह अवधि 16 दिन की रही, जबकि 1962 और 1967 में चार चरणों में मतदान संपन्न हुआ। 1969 का चुनाव इतिहास में इसलिए खास है, क्योंकि यह पहली बार था जब पूरे राज्य में 9 फरवरी को सिर्फ एक ही दिन मतदान हुआ। 1972 में बिहार में चार चरणों में 5, 7, 9 और 11 मार्च को मतदान हुआ। जबकि 1977 में तीन चरणों में 10, 12 तथा 14 जून को मतदान सम्पन्न हुआ। 1980 में भी इतिहास दोहराया गया और एक ही दिन 31 मई को मतदान हुआ। 1985 में 2 और 5 मार्च को दो चरणों में चुनाव संपन्न हुआ। 1990 में एक बार फिर एक ही दिन में मतदान कराया गया और वो तारीख 27 फरवरी रही। 1995 में पांच चरणों में 11, 15, 21, 25 और 28 मार्च को, जबकि साल 2000 में तीन चरणों में 12, 17 और 22 फरवरी को मतदान हुए। साल 2005 फरवरी में तीन चरणों 3, 15 और 23 फरवरी को चुनाव हुए। इसी साल एक फिर चुनाव की रणभेरी बजी और 4 चरणों में 18 व 26 अक्टूबर, 9 व 13 नवंबर को चुनाव कराए गए। अगर बात 2010 की करें, तो छह चरणों में 21, 24 व 28 अक्टूबर तथा 1, 9 व 20 नवंबर को वोटिंग हुई। 2015 में 5 चरणों में 12, 16 व 18 अक्टूबर तथा 1 व 5 नवंबर को मतदान हुआ। साल 2020 में तीन चरणों में 28 अक्टूबर, 3 और 7 नवंबर को मतदान हुआ। जबकि इस साल यानी की 2025 में दो चरणों में चुनाव होने हैं। 6 नवंबर को वोटिंग हो चुकी है, दूसरे चरण के लिए 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे।
1952 में जब पहली बार बिहार की जनता ने मताधिकार का प्रयोग किया, तब वोटिंग प्रतिशत सिर्फ 42.06% था। धीरे-धीरे लोकतंत्र की जड़ें गहराती गईं और जनता का विश्वास बढ़ता गया। 1957 में मतदान 43.24%, 1962 में 44.47%, और 1967 में यह बढ़कर 51.51% पहुंच गया। 1972 और 1969 में यह आंकड़ा 52.79% पर स्थिर रहा। 1980 में 57.28% और 1990 में 62.04% तक पहुंचते ही यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की जनता अब राजनीतिक रूप से कहीं अधिक सजग हो चुकी है। साल 2000 के बाद यह रुझान और मजबूत हुआ, जब 2000 में 62.57% मतदान हुआ। लेकिन फरवरी 2005 में यह आंकड़ा गिरकर महज 46.05% हो गया, इसी साल अक्टूबर में फिर चुनाव हुए तो इसमें और गिरावट दर्ज की गई, अबकी बार यह आंकड़ा 45.85% पर सिमट गया। इसके बाद लगातार वोटिंग प्रतिशत में उछाल देखने को मिला। साल 2010 में 52.73%, साल 2015 में 56.91% और 2020 में 57.29 फीसदी वोट पड़े। इस बार यानी 2025 के पहले चरण में 64.66 प्रतिशत वोट पड़े।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में लगातार बढ़ता मतदान प्रतिशत लोकतंत्र में विश्वास को मजबूत करता है। साथ ही यह भी संकेत है कि अब मतदाता सिर्फ जातीय या भावनात्मक मुद्दों पर नहीं बल्कि शासन, विकास और जवाबदेही को आधार बना कर मतदान कर रहा है। 2025 का बढ़ा हुआ मतदान युवा मतदाताओं की सक्रियता और सत्ता-विरोधी भावना दोनों को दर्शाता है। 1952 से अब तक बिहार की सियासत ने नायक बदले, समीकरण बदले लेकिन जनता की भागीदारी लगभग हर बार और मजबूत हुई। 1952 के 42% से 2025 के लगभग 65% तक का सफर बताता है कि बिहार अब सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि जनजागरण का प्रतीक बन चुका है।
कोविड-19 महामारी के बीच हुए 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव देश के लिए एक बड़ी परीक्षा थे। तीन चरणों में हुए इस मतदान में पहले चरण में 71, दूसरे में 94 और तीसरे में 78 सीटों पर वोटिंग हुई। कुल 57.29 फीसदी मतदान हुआ। 10 नवंबर, 2020 को आए नतीजों में एनडीए को 125 सीटें, महागठबंधन को 110, जबकि एआईएमआईएम को पांच, बसपा और लोजपा को एक-एक सीट मिली। एनडीए में जदयू ने 43, भाजपा ने 74, जबकि वीआईपी और हम को चार-चार सीटें मिलीं। इस तरह नीतीश कुमार ने सातवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
अक्टूबर-नवंबर 2015 के चुनाव में बिहार ने एक अनोखा गठबंधन देखा जब राजद, जदयू और कांग्रेस एक साथ आए, जबकि भाजपा ने लोजपा, रालोसपा और हम के साथ चुनाव लड़ा। 243 सीटों वाले विधानसभा में राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जदयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। भाजपा 53 सीटों पर सिमट गई। महागठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल की और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन दो साल बाद 2017 में जदयू ने गठबंधन तोड़ भाजपा से हाथ मिला लिया।
2010 के चुनाव में नीतीश कुमार और भाजपा की जोड़ी ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की। छह चरणों में हुए चुनाव में जदयू ने 141 में से 115 और भाजपा ने 102 में से 91 सीटें जीतीं। राजद 168 सीटों पर चुनाव लड़कर मात्र 22 पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस को केवल चार सीटें मिलीं। यह चुनाव बिहार की राजनीति में सुशासन शब्द के स्थायी होने का प्रतीक बना।
2005 का चुनाव बिहार की राजनीति के लिए ऐतिहासिक रहा। फरवरी में हुए चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। राजद 75, जदयू 55, भाजपा 37 सीटों पर रही। परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लगा और अक्टूबर में दोबारा चुनाव कराए गए। इस बार जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया, जिसमें जदयू को 88 और भाजपा को 55 सीटों पर जीती। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और यहीं से बिहार में विकास बनाम जाति की नई राजनीति की शुरुआत हुई।
2000 का चुनाव बिहार के इतिहास में इसलिए खास था क्योंकि यह एकीकृत बिहार का अंतिम विधानसभा चुनाव था। तब राज्य में कुल 324 सीटें थीं। राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा और 124 सीटें जीतीं, भाजपा को 67, समता पार्टी को 34 और कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं। राबड़ी देवी फिर से मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन इसी साल नवंबर में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन हुआ।
1995 के चुनावों में जनता दल ने 264 सीटों पर चुनाव लड़कर 167 पर जीत दर्ज की। भाजपा को 41 और कांग्रेस को 29 सीटें मिलीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा को 10 और नई समता पार्टी को 7 सीटें मिलीं। लालू यादव ने लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन 1997 में चारा घोटाले के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने और आरजेडी के गठन के साथ बिहार की राजनीति नए युग में प्रवेश कर गई।
1980 के चुनाव में कांग्रेस (इंदिरा) को 169 सीटों के साथ सत्ता मिली, लेकिन 1985 में वह अपने चरम पर रही। 196 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत। हालांकि इस दौर में बार-बार नेतृत्व परिवर्तन ने पार्टी की पकड़ कमजोर की। 1990 के चुनाव में जनता दल ने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में 122 सीटें जीतकर कांग्रेस से सत्ता छीन ली। इसी के साथ बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय का नया अध्याय शुरू हुआ।
1969 में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो बनी लेकिन बहुमत से दूर रही। 318 सीटों में से 118 जीतकर उसने सरकार तो बनाई, मगर यह दौर राजनीतिक अस्थिरता का रहा। 1972 में कांग्रेस ने फिर वापसी की और 259 में से 167 सीटें जीतीं। लेकिन 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की सुनामी आई, उसने 311 सीटों में से 214 जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। इसी दौर में कर्पूरी ठाकुर और रामसुंदर दास जैसे नेता मुख्यमंत्री बने और जन आंदोलन की राजनीति को धार मिली।
आजादी के बाद बिहार में कांग्रेस का दबदबा स्पष्ट था। 1952 के पहले चुनाव में पार्टी को 322 में से 239 सीटें मिलीं और श्रीकृष्ण सिंह राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। 1957 में भी कांग्रेस ने 312 में से 210 सीटें जीतीं। 1962 में कांग्रेस को 185 सीटों के साथ एक बार फिर बहुमत मिला। हालांकि 1967 के चुनाव में कांग्रेस का प्रभाव घटा और वह 128 सीटों तक सिमट गई। इस दौरान एसएसपी और जनसंघ जैसी पार्टियों ने धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में पैठ बनानी शुरू कर दी।
बिहार की चुनावी यात्रा लोकतंत्र की सबसे सशक्त मिसालों में से एक रही है। सात दशकों के भीतर बिहार के मतदाताओं ने जो राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है, वह पूरे देश के लिए उदाहरण बनी है। 2025 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 64.66 तक पहुंच गया है, जो न केवल जनभागीदारी का संकेत है बल्कि बदलाव की गूंज भी है। इन वर्षों में बिहार ने सत्ता परिवर्तन के कई दौर देखे कांग्रेस का प्रभुत्व, समाजवादी लहर, लालू-राबड़ी युग, नीतीश कुमार का सुशासन और अब नई पीढ़ी की राजनीति। हर चुनाव ने बिहार की सामाजिक संरचना, आर्थिक आकांक्षाओं और राजनीतिक सोच को नया रूप दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 2025 का चुनाव बिहार की जनता के लिए पिछले दो दशकों की नीतियों का जनमत संग्रह साबित हो सकता है।
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