बिहार की राजनीति में प्रभाव, पहुंच और पहचान का मापदंड समय के साथ बदलता रहा है। एक दौर था जब नेताओं का कद लंबी संसदीय पारी और लगातार जीत से तय होता था लेकिन हाल के दशकों में राजनीतिक व्यक्तित्व की चमक धुंधली हुई है। पार्टियों की रणनीति, जातीय गठजोड़ और वोट बैंक की गणित ने चुनाव जीतने की संरचना बदल दी है। इसके बावजूद कुछ नेता ऐसे हैं जिनकी लंबी पारी आज भी बिहार की सियासत में प्रेरक कहानी बनकर दर्ज है और इनमें नालंदा की भूमिका विशेष रही है।
हरिनारायण सिंह ने दसवीं बार जीता चुनाव
नालंदा जिले से लंबे समय तक विधायक रहे सत्यनारायण आर्य की चर्चा वर्षों तक होती रही लेकिन अब यह केंद्र हरिनारायण सिंह की रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धि पर टिक गया है। जदयू के हरिनारायण सिंह इस बार लगातार दसवीं बार विधानसभा चुनाव जीतकर बिहार के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण बन गए हैं। हरनौत सीट से उनकी लगातार चार बार की जीत भी इसे और खास बनाती है। नालंदा की ही हरनौत सीट का इतिहास मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर से भी जुड़ा रहा है। नीतीश इसी सीट से 1985 और 1995 में जीते, जबकि 1977 और 1980 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यदि 2020 में बोचहां के पूर्व विधायक रमई राम पराजित नहीं हुए होते, तो बिहार में सबसे अधिक बार जीतने का रिकॉर्ड वे अपने नाम कर सकते थे। रमई राम नौ बार विधायक रहे और 2020 की हार के बाद उनका देहांत हो गया लेकिन उनका अविभाज्य राजनीतिक सफर आज भी एक प्रबल उदाहरण है।
भाजपा के प्रेम कुमार ने नौंवी और राघवेंद्र प्रताप सिंह ने आठवीं बार जीता चुनाव
यही नौ जीत का रिकॉर्ड कहलगांव के दिग्गज नेता स्व. सदानंद सिंह और गया के शहरी क्षेत्र में भाजपा नेता प्रेम कुमार के नाम भी दर्ज है, जिन्होंने 1990 से अब तक लगातार चुनावी जीत का इतिहास रचा है। सुपौल में बिजेंद्र यादव और नालंदा के श्रवण कुमार ने बिना किसी हार के अपनी आठवीं जीत दर्ज की है। मधेपुरा की आलमनगर सीट से नरेंद्र नारायण यादव भी आठ बार जीत कर रिकॉर्ड की इस श्रेणी में शामिल हैं। बड़हरा से बीजेपी के राघवेंद्र प्रताप सिंह की आठवीं जीत, पटना साहिब से नंदकिशोर यादव की सात लगातार जीतें और सातवीं बार विजयी बने विजय कुमार चौधरी व श्याम रजक का जीत-हार के उतार-चढ़ाव से भरा सफर भी दिलचस्प है। गया की इमामगंज सीट से जीतन राम मांझी आठ बार विधायक रहे। 2024 में उनके सांसद बनने के बाद उनकी बहू दीपा कुमारी उपचुनाव और 2025 दोनों में विजयी रहीं। इन तमाम नामों की लंबी जीत की लकीर इस बात का प्रमाण है कि बिहार की राजनीति बदलने के बावजूद कुछ नेता अपने जनाधार, कार्यशैली और निरंतर सक्रियता से आज भी परंपरागत राजनीतिक कद को जिंदा रखे हुए हैं।