
Caste Based Politics in Bihar: 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान लालू यादव ने कहा था कि विकास के नाम पर चुनाव नहीं जीते जाते, विकास नहीं सम्मान चाहिए, जनता विकास के नाम पर वोट नहीं देती। लालू यादव का ऐसा कहना लाजमी भी था, क्योंकि उनकी राजनीति का केंद्र सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों का सम्मान था।
बिहार चुनाव में विकास के मुद्दे तो वैसे साल 2000 के विधानसभा चुनाव में जुड़ गए थे, लेकिन उसका असर साल 2005 के चुनाव में देखने को मिला जब नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय के साथ विकास की राजनीति के सहारे सूबे की सत्ता हासिल की। बावजूद इसके जातीय समीकरण का असर किसी भी चुनाव में कम नहीं हुआ। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में तमाम दलों के प्रत्याशियों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है। जाति आज भी बिहार की राजनीति के केंद्र में बना हुआ है।
बिहार में साल 1972 से कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिरना शुरू हो गया था। 80 का दशक आते-आते कांग्रेस हाशिए पर जा चुकी थी। बिहार के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने बड़ी मुश्किल से बहुत कम समय के लिए अपनी सरकार चलाई। ये वो वक्त था जब जनता दल का उदय हो रहा था। लेकिन इस दल में भी दलित और पिछड़ी जातियों के चेहरों का गठजोड़ था। सवर्णों की राजनीति का पराभाव हो रहा था।
एक वक्त था जब लालू-नीतीश यानी यादव-कुर्मी गठजोड़ के साथ बिहार में कांग्रेस विरोधी राजनीति जोर पकड़ रही थी। इसी दौरान बीजेपी का राष्ट्रवाद भी धीरे-धीरे उठता गया। लेकिन कामयाबी जाति की राजनीति के हाथ लगी। वक्त के साथ नीतीश और लालू की एक जैसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने दोनों की राहें अलग कर दीं। लालू यादव ने सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्म्यूला खोज निकाला था। उन्होंने यादव-मुस्लिम गठजोड़ के साथ अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति का मिश्रण कर बिहार की सत्ता हासिल कर ली।
लालू यादव सत्ता में आए तो उनकी मंशा लंबी पारी खेलने की थी। लिहाजा उन्होंने अगड़ों-पिछड़ों की सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्म्युले को जमीन पर मजबूती से उतारना शुरू किया। "भूरा बाल" साफ करो वाला फॉर्म्यूला जैसे-जैसे हिट होता गया, उनका राजनीतिक कद बढ़ता गया। 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद तो लालू की राजनीति में चार चांद लग गए।
पहले लालू यादव, फिर उनके जेल जाने के बाद राबड़ी देवी के शासन काल में विकास का मुद्दा कोमा में चला गया। तब सूबे में बुनियादी सुविधाओं के विकास के मुद्दा को लकवा मार गया था। बिहार में कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने पर विचार करना मतलब जातीय समीकरण और मुस्लिम ध्रुवीकरण को तिलांजलि देने जैसा था। लिहाजा गर्त में जाती कानून व्यवस्था और सामाजिक विद्वेष ने हथियारबंद जातीय सेनाओं को जन्म दिया। स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं और तब नीतीश कुमार का उदय हुआ।
लालू यादव के बाद बारी थी नीतीश कुमार की। लालू के राज में जब अपहरण, फिरौती, सड़क, बिजली-पानी, रोजगार, व्यापार के मुद्दे दम तोड़ने लगे तब लोगों में छटपटाहट बढ़ी। नीतीश कुमार ने स्थिति को भांपते हुए विकास और जंगलराज के मुद्दे को हवा दी। साथ में उन्होंने अगड़ी और पिछड़ी दोनों जातियों को साधने में सफलता हासिल की और इसी समीकरण के सहारे बिहार की सत्ता पर 20 साल तक राज किया। आज बिहार में चुनावी मुद्दे आईटी हब और हाईटेक सिटी भी बन चुके हैं। बावजूद इसके जातीय समीकरण ही राजनीतिक दलों को जीत की गारंटी नजर आ रहे हैं।
जेडीयू ने अपने 101 उम्मीदवारों में 37 OBC, 22 EBC, 22 जनरल, 15 SC, एक ST और 4 मुस्लिमों को टिकट दिया है। बीजेपी ने अपने 101 प्रत्याशियों में सबसे ज्यादा 49 सीटों पर सवर्ण जाति के लोगों को टिकट दिया है। इनमें 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण और 13 वैश्य शामिल हैं। दलित और अति पिछड़ा वर्ग के 12-12 उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है। बीजेपी 7 कुशवाहा, 6 यादव, दो कुर्मी और एक कायस्थ को भी मैदान में उतारा है।
उधर, आरजेडी ने अपने पहले फेज में जारी किए गए 52 उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा 22 यादवों को टिकट दिया है। इसके अलावा तीन मुस्लिम, तीन ब्राह्मण और तीन भूमिहार शामिल हैं। कांग्रेस ने अपने 54 प्रत्याशियों में 19 सवर्णों को टिकट दिया है। इनमें 8 भूमिहार, 6 ब्राह्मण और 5 राजपूत शामिल हैं। वहीं ओबीसी में 4 यादव, 3 वैश्य, एक कुर्मी, एक कुशवाहा और एक गोस्वामी समाज से शामिल है। इस तरह किसी भी पार्टी ने टिकट बंटवारे में जातीय समीकरणों का पूरा-पूरा ख्याल रखा है।
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