Bihar Election: लाल आतंक के साये से निकली जमुई जिले की झाझा विधानसभा सीट का गणित, एनडीए और महागठबंधन में कड़ी टक्कर

झारखंड की सीमा से सटे जमुई जिले में बिहार के मिनी शिमला के नाम से मशहूर सिमुलतला को अपनी कोख में समेटे झाझा विधानसभा क्षेत्र इन दिनों चुनावी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है, जहां एनडीए और महागठबंधन के उम्मीदवार एक दूसरे को पटखनी देने की फिराक में मैदान में उतरे हैं।

Rajkumar Singh
अपडेटेड9 Nov 2025, 07:18 PM IST
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव(HT)

साल 2025 का झाझा विधानसभा सीट भी काफी दिलचस्प नजर आ रहा है। जेडीयू ने जहां बिहार सरकार के पूर्व मंत्री दामोदर रावत पर एक बार फिर विश्वास दिखाया है, वहीं आरजेडी ने पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के बेहद करीबी पूर्व केंद्रीय मंत्री जय प्रकाश नारायण यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है। जेडीयू और आरजेडी के उम्मीदवार इस सीट पर जीत के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। जबकि जनसुराज यहां त्रिकोणीय मुकाबले के लिए दम लगा रही है। इस सीट का जातीय समीकरण जमुई के बाकी सीटों के मुकाबले अलग नजर आ रहा है।

झाझा विधानसभा सीट का चुनावी गणित

झाझा विधानसभा सीट पर आरजेडी और जेडीयू के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है। लेकिन जन सुराज पार्टी के डॉक्टर नीलेन्दु दत्त मिश्रा , बहुजन समाज पार्टी के शिवराज यादव और और निर्दलीय मोहम्मद इरफान समेत कुल नौ उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से मुकाबला रोचक हो गया है। साल 2020 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर जेडीयू के दामोदर रावत विजयी हुए थे। दामोदर रावत को कुल 76,972 वोट मिले थे, जबकि आरजेडी उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद दूसरे नंबर पर रहे थे, जिन्हें 75,293 वोट मिले थे। इस तरह बेहद कड़े मुकाबले में दामोदर रावत को 1,679 वोट से जीत मिली थी

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मुस्लिम वोटों से आरजेडी को उम्मीद

इस बार राजद ने राजेंद्र प्रसाद को टिकट न देकर जय प्रकाश नारायण यादव को उम्मीदवार बनाया है। जय प्रकाश की इस मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में जेडीयू के उम्मीदवार से अक्सर कड़ी टक्कर देखने को मिलती है। झाझा एक जनरल सीट है जिसका ज्यादातर इलाका ग्रामीण क्षेत्रों से मिलकर बना है। जहां कुल 3,38,667 मतदाता हैं। इनमें से अनुसूचित जातियों की जनसख्या करीब 15.85 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों की 4.42 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय के लगभग 11.2 प्रतिशत मतदाता है।

झाझा विधानसभा सीट का इतिहास

झाझा विधानसभा क्षेत्र से 1952 में कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह, 1957 में दो विधायक कांग्रेस के भागवत मुर्मू और चंद्रशेखर सिंह , 1962 में सोशलिस्ट पार्टी के श्रीकृष्ण सिंह, 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के शिवनंदन झा, 1969 में कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह, 1972 में सोशलिस्ट पार्टी के शिवनंदन झा, 1977 में जनता पार्टी के शिवनंदन झा, 1980 में कांग्रेस के शिवनंदन यादव, 1985 में कांग्रेस के शिवनंदन यादव,1986 में कांग्रेस के डॉ.रविंद्र यादव,1990 में जनता दल के शिवनंदन झा ,1995 में कांग्रेस के डॉ.रविंद्र यादव 2000 में समता पार्टी के दामोदर रावत जीते।

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झारखंड अलग होने के बाद बदले नतीजे

साल 2000 में बिहार से झारखंड अलग होने के बाद जमुई से इस सीमावर्ती जिले में कांग्रेस की पकड़ कमजोर होती गई। साल 2005 फरवरी में जेडीयू के दामोदर रावत, साल 2005 अक्टूबर में जेडीयू के दामोदर रावत, साल 2010 में जेडीयू के दामोदर रावत, साल 2015 में बीजेपी के डॉ.रविंद्र यादव और साल 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के दामोदर रावत चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे। साल 1957 के विधानसभा चुनाव में झाझा दो सदस्यीय क्षेत्र था इसलिए एक आरक्षित वर्ग के और एक सामान्य वर्ग के विधायक चुने गए थे। इस क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीतने वाले चंद्रशेखर सिंह बाद में बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी बने थे।

जातीय समीकरण में छिपी हार और जीत

इस बार 2025 का चुनावी समर भी कुछ वैसा ही दिखाई पड़ रहा है और जातीय समीकरण को साधने में हर प्रत्य़ाशी लगा हुआ रहा है। इन दिनों झाझा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी माहौल गरमा गया है। विकास के मुद्दों के साथ जातीय समीकरणों पर नेता जोर दे रहे हैं। अलग-अलग समुदाय अपने-अपने तरीके से समीकरण साधने में लगे हैं। देखना ये है कि झाझा की गद्दी पर फिर दामोदर रावत की वापसी होगी या जनता किसी दूसरे नेता पर विश्वास जताएगी। इस क्षेत्र में 11 नवंबर को वोट डाले जाएगें और 14 नवंबर को मतपेटी खुलने के बाद झाझा के नये प्रतिनिधि का एलान होगा।

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