बिहार विधानसभा चुनाव का असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा असर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिलेगा। जहां साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं बिहार के पूरब में स्थिति पश्चिम बंगाल में भी इसका असर देखने को मिलेगा, जहां विधानसभा चुनाव होने में बमुश्किल तीन से चार महीने का वक्त बचा है। बिहार में एनडीए की सरकार दुहराए जाने की स्थिति में भी यहां से कई सियासी संदेश निकल कर देश में जाएगा।
बिहार में स्थिरता बनाम बदलाव की लड़ाई
बिहार विधानसभा का पूरा चुनाव एनडीए ने स्थितरता, कानून व्यवस्था और बिहार को विकसित राज्य बनाने के मुद्दे पर लड़ा है। अगर एनडीए को इस चुनाव में जनादेश मिलता है तो इसका सीधा मतलब ये होगा कि प्रदेश की जनता ने स्थिरता और विकास के मुद्दे पर अपना वोट दिया है। इस जीत से नीतीश कुमार की पार्टी को एक और नई राजनीतिक लाइफ लाइन मिलने की संभावना जताई जा रही है। वहीं बीजेपी के लिए भी ये बहुत कुछ हासिल करने के द्वार खोलेगा। एनडीए ने निरंतर विकास, स्थिरता, शिक्षा, सड़क, बुनियादी सुविधाओं के विकास से एक कदम आगे बढ़ते हुए बिहार में उद्योग धंधे लगाने के नाम पर लड़ा। एनडीए गठबंधन को जनादेश मिलने की स्थिति में बीजेपी को पश्चिम बंगाल में पिछले तीन बार से सत्ता हासिल करने की कोशिश में कुछ बल मिलेगा।
बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव
बिहार विधानसभा चुनाव अपने अंतिम चरण की तरफ बढ़ चुका है। 14 नवंबर को वोटों की गिनती के बाद पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी। उसके बाद चुनावी सफर का नया सिलसिला पश्चिम बंगाल में शुरू होगा। जहां साल 2026 की शुरूआत यानी मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी साल 2016 और 2021 में सत्ता हासिल करने की पुरजोर कोशिश कर चुकी है। ममता एक तरफ खुलकर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश करती नजर आती हैं जिसके जवाब में बीजेपी यहां हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश करेगी।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी को मिलेगा बल
अगर बिहार के विधानसभा चुनाव एनडीए के पक्ष में आते हैं तो बीजेपी को पश्चिम बंगाल में एक तरह से मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलने की संभावना है वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर राजनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना है। बीजेपी साल 2016 से ही पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही है। हालांकि बीजेपी के लिहाज से साल 2016 के परिणाम बहुत खराब रहे थे, उस वक्त ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने 294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में 211 सीटों के साथ बंपर जीत हासिल की थी। जबकि काग्रेस को 22 और CPI(M) को 26 सीटें मिली थीं। लेकिन बीजेपी के खाते में महज 3 सीटें आई थीं। लेकिन साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 77 सीटें जीती थी। वहीं इस बार ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने अपने साल 2016 के प्रदर्शन को और बेहतर करते हुए 213 सीटें हासिल की थी।
बंगाल में ममता पर बढ़ सकता है दबाव
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत खासकर बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में ममता बनर्जी पर दबाव बढ़ेगा। इस साल के शुरूआत में पश्चिम बंगाल में वक्फ कानून के विरोध में हुई हिंसा को लेकर बीजेपी ने ममता बनर्जी को घेरा था। मालदा, मुर्शीदाबाद, बीरभूम, नादिया, दक्षिण दिनाजपुर और 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में फैली हिंसा और हिन्दुओं का पलायन बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। इसके अलावा मेडिकल छात्रा से रेप को लेकर उपजे बवाल ने भी ममता सरकार के सामने संकट खड़ा किया था। जिस तरह टीएमसी मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण पर जोर देती हैं उसी तरह बीजेपी बंगाल में हिन्दू वोटर्स को एकजुट करने की कोशिश में जुटी है, लिहजा इस बार ममता बनर्जी के सामने कड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में ममता बनर्जी पर महागठबंधन में शामिल होने का दबाव बढ़ता नजर आ सकता है। बीजेपी की चुनौती से निपटने के लिए ये भी संभव है कि ममता लेफ्ट और काग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में भी गठबंधन पर विचार करें। जो ममता बनर्जी के लिए अभी तक पश्चिम बंगाल से बाहर तक सीमित है।