
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की करारी हार के बाद कांग्रेस, आरजेडी, वीआईपी, राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मुकेश सहनी और लेफ्ट पार्टियों के नतीजे बहुत ही निराशाजनक हैं। ऐसे वक्त में बिहार में एक बार फिर असदुद्दीन की पार्टी AIMIM ने शानदार प्रदर्शन दिया है। इस बार के चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि मुस्लिमों ने पूरी तरह से आरजेडी का साथ छोड़ दिया उन्होंने एक मुश्त ओवैसी की पार्टी को वोट दिया। वहीं यादव भी आरजेडी के पाले से छिटक गया।
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जब महागठबंधन में सीटों क बंटवारे की चर्चा चल रही थी तब AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने लालू यादव और तेजस्वी यादव से गठबंधन में शामिल करने की मांग की थी। लेकिन इन दोनों ने ओवैसी की मांग पर विचार नहीं किया। नतीजा ये हुआ की पूरे सीमांचल में आरजेडी की बुरी दुर्गती हुई। दूसरी तरफ सीमांचल की मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाकों में AIMIM ने शानदार प्रदर्शन किया और उसने 5 सीटों पर जीत दर्ज की।
नेपाल बॉर्डर से लगते बिहार के सीमांचल के जिलों अररिया, किशंगंज, कटिहार और पूर्णिया में मुस्लिम आबादी ही जीत हार तय करती है। सीमांचल के इन चार जिलों में 24 विधानसभा सीटें हैं इन सीटों पर आरजेडी बेहतर प्रदर्शन की बदौलत विधानसभा में मजबूत स्थिति दर्ज कराती रही है। लेकिन इस बार इन 24 में से 5 सीटों पर ओवैसी की पार्टी AIMIM ने जीत दर्ज की है। बाकी की 19 सीटों में से 14 सीटों पर एनडीए ने जीत दर्ज किया है। पांच सीटों पर AIMIM और पांच सीटें महागठबंधन के खाते में आई है।
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की 24 विधानसभा सीटों में से 12 सीटों पर एनडीए गठबंधन ने कब्जा जमाया था। जिनमें से 8 सीट बीजेपी तो चार सीट जेडीयू ने जीती थी। वहीं महज 7 सीटों पर महागठबंधन ने जीत दर्ज की थी, जिनमें से चार कांग्रेस और 3 आरजेडी के खाते में आई थी। वहीं AIMIM ने पांच सीटों पर जीत का परचम लहराया था।
ओवैसी की पार्टी AIMIM ने बिहार की सिर्फ 5 सीटों पर जीत दर्ज नहीं की है बल्कि 24 सीटों पर महागठबंधन को हराने में भी अहम भूमिका निभाई है। ओवैसी की पार्टी ने बिहार में 29 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और इन सभी सीटों पर महागठबंधन की हार हुई है। सिर्फ सीमांचल में ही महागठबंधन को कम से कम 5 सीटों का नुकसान हुआ है। अगर ओवैसी की पार्टी के साथ तेजस्वी ने 6 सीटों पर गठबंधन कर लिया होता तो कम से कम महागठबंधन को 19 सीटों का फायदा हुआ था। जिसमें ओवैसी की पार्टी की जीती हुई पांच सीटें मिला दी जाएं तो महागठबंधन को 24 सीटों का सीधे-सीधे नुकसान हुआ है।
साल 2025 के नीतजों में जो परिणाम आरजेडी के लिए आए हैं उससे लग रहा है कि सिर्फ मुसलमानों ने ही नहीं यादवों ने भी आरजेडी का साथ छोड़ दिया है। दूसरी तरफ मौके की नजाकत को समझते हुए एनडीए इस वोट और अपने वाले में करने के लिए पुरजोर कोशिश करती नजर आ रही है। यही वजह है कि बीजेपी की तरफ से यादवों के बड़े चेहरों में से एक राम कृपाल यादव को डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चा जोर पकड़ रही है। इस बार के विधानसभा चुनाव में जो नतीजे महागठबंधन के पक्ष में आए हैं उसे देखते हुए साल 2030 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के लिए ओवैसी मजबूरी बन जाएंगे। तेजस्वी को किसी भी कीमत पर ओवैसी की पार्टी को साथ लेकर चुनाव लड़ना मजबूरी बन सकती है। क्योंकि इस बार के नतीजे बता रहे हैं कि बिहार का मुसलमान अब आरजेडी को छोड़ ओवैसी के साथ नजर आ रहा है। स्थिति ऐसी ही रही तो साल 2029 के लोकसभा चुनाव में भी ओवैसी को महागठबंधन में शामिल करना मजबूरी हो जाएगी।
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