UP BJP President: यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष बने पंकज चौधरी, सीएम योगी आदित्यनाथ से कैसा है संबंध?

Pankaj Chaudhary: उत्तर प्रदेश भाजपा के नए अध्यक्ष पंकज चौधरी की नियुक्ति 2027 चुनाव से पहले ओबीसी वोट साधने की बड़ी रणनीति है। केंद्रीय आलाकमान के करीबी माने जाने वाले चौधरी का अध्यक्ष बनना, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव को संतुलित करने और संगठन को नई दिशा देने की कोशिश मानी जा रही है।  

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड14 Dec 2025, 02:17 PM IST
पंकज चौधरी बने यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष।
पंकज चौधरी बने यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष।(PTI)

Pankaj Chaudhary News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) वोटों को साधने के लिए बीजेपी ने एक बड़ा और रणनीतिक दांव खेला है। महाराजगंज से सात बार के सांसद और केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री रहे पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। रविवार को लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने उनके नाम की औपचारिक घोषणा की।

चौधरी कुर्मी ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, और उनकी नियुक्ति को 2024 लोकसभा चुनावों में हुए कुर्मी वोटों के बिखराव को रोकने और 2027 विधानसभा चुनावों से पहले ओबीसी जनाधार को मजबूत करने की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

केंद्रीय आलाकमान की पसंद: योगी बनाम 'दिल्ली-केंद्रित' उभार

पंकज चौधरी की राजनीतिक यात्रा और उनका उभार इस बात का संकेत देता है कि वह सीधे केंद्रीय आलाकमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद नेता हैं। उन्हें केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री का पद मिलना इस बात का प्रमाण है कि दिल्ली नेतृत्व उन्हें विश्वसनीय और संतुलित नेता मानता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका अध्यक्ष बनना राज्य संगठन को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत राजनीतिक छाया से आंशिक रूप से अलग रखने की पार्टी की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। कई जानकारों ने इसे 'योगी के दबदबे को काउंटर' करने और संगठन में 'संतुलन साधने वाले' (Balancing Figure) की भूमिका तैयार करने की कोशिश बताया है।

योगी के प्रभाव को सीमित करने वाले उदाहरण

चौधरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबंधों की पड़ताल बताती है कि वे योगी के 'इनर सर्कल' का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि नामांकन प्रक्रिया में योगी आदित्यनाथ ने प्रस्तावक के रूप में औपचारिक समर्थन दिया, लेकिन दोनों नेताओं के बीच ऐतिहासिक दूरी साफ दिखती है।

पूर्वांचल में सीमा-रेखा: पंकज चौधरी ने अपने गढ़ महाराजगंज में योगी के राजनीतिक प्रभाव को 'बार्डर पर ही समेट' रखा है। दोनों के संयुक्त अभियान या मंच पर पुरानी तस्वीरें दुर्लभ हैं। प्रोटोकॉल-आधारित मुलाकातों को छोड़कर, दोनों के बीच निकटता के प्रमाण कम ही रहे हैं।

औपचारिक समर्थन, आंतरिक संकेत: शनिवार को नामांकन समारोह में योगी आदित्यनाथ के साथ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक की उपस्थिति महज पार्टी की आंतरिक संतुलन बनाए रखने की मजबूरी मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में इस नियुक्ति को सीधे योगी के प्रभाव को बैलेंस करने के संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

कार्यकर्ताओं में नई उम्मीद: संगठन को मिलेगी नई धार?

पंकज चौधरी की ताजपोशी से बीजेपी कार्यकर्ताओं में एक 'नई उम्मीद' जगी है। सोशल मीडिया पर भी कई चर्चाएं यह संकेत देती हैं कि चूंकि चौधरी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के व्यक्तिगत नेटवर्क से दूरी बनाए रखते हैं, इसलिए उन्हें 'संगठन के करीब' का नेता माना जाता है।

यह उम्मीद है कि वह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक ओबीसी बेल्ट में पार्टी को मजबूत करेंगे और योगी के 'हिंदुत्व फोकस' को जातिगत समीकरणों से संतुलित करेंगे। हालांकि पंकज चौधरी 'मास अपील' का अब तक कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन उनकी संगठनात्मक भूमिका मुख्यमंत्री के एकाधिकार को नियंत्रित करने वाली हो सकती है।

तटस्थता, जो केंद्रीय नेतृत्व के करीब है

पंकज चौधरी को 'योगी विरोधी' कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री की आलोचना नहीं की। लेकिन उन्हें 'योगी के करीबी' कहना भी उतना ही गलत होगा।

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने अपने एक यूट्यूब वीडियो में कहा है कि केंद्रीय आलाकमान ने पंकज चौधरी का चयन इसलिए भी किया है क्योंकि वह योगी आदित्यनाथ के कम-से-कम करीबी तो नहीं हैं। प्रदीप सिंह के मुताबिक, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने पंकज चौधरी का चुनाव कर जता दिया है कि वह योगी आदित्यनाथ पर लगाम लगाए रखना चाहता है।

हालांकि, सार्वजनिक तथ्यों, केंद्रीय कैबिनेट में उनकी भूमिका और पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन की राजनीति के आधार पर उनकी स्थिति को सबसे सटीक रूप में 'केंद्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद, योगी-तटस्थ और संगठन-केंद्रित नेता' के तौर पर समझा जा सकता है। खतरा यह है कि जब विधानसभा चुनाव में बस एक वर्ष ही बचा है, तब सरकार और संगठन के बीच कोई खाई तो पैदा नहीं होगी? अगर ऐसा होता है तो लगाम सिर्फ योगी पर नहीं लगेगा, चुनाव में नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ेगा।

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