वैसे तो बिहार में मतदान का आधार जाति दशकों से रही है, लेकिन 1990 के दशक के बाद सभी पार्टियों ने अपना वोट बैंक और जनाधार बढ़ाने के लिए जातिवाद को खूब बढ़ावा दिया। लेकिन सूबे की सभी राजनीतिक पार्टियों को ये एहसास हो गया है कि अब जीत के लिए सिर्फ जातीय समीकरण साधना जीत की गारंटी नहीं रह गई है। इस बार सभी पार्टियों ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट बांटे हैं। पिछले 20 वर्षों के बिहार चुनाव के पैटर्न पर नजर डालें तो पता चलता है कि विकास और रोजगार हर चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनता रहा है। इसबार तो सभी दलों के चुनावी एजेंडे में विकास और रोजगार ही प्राथमिकता नजर आ रही है।
नीतीश कुमार ने कुंद की जातिवाद की धार
बिहार में अगर जातिवाद का असर कम हुआ है तो उसका श्रेय काफी हद तक नीतीश कुमार को जाता है। साल 2005 का विधानसभा चुनाव उन्होंने कानून व्यवस्था और जंगलराज के मुद्दे पर लड़ा था। उस वक्त उनका एक ही नारा था सुशासन, यही वजह है कि नीतीश कुमार का उपनाम सुशासन बाबू पड़ गया। साल 2010 का चुनाव उन्होंने पूरी तरह सुशासन और विकास के मुद्दे पर ही लड़ा था। उस वक्त के चुनाव में विकासवाद का मुद्दा जातिवाद के मुद्दे पर भारी पड़ा।
साल 2010 में नीतीश की प्रचंड जीत
साल 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने अपने राजनीतिक इतिहास की सबसे प्रचंड जीत हासिल की थी। जेडीयू को 115 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि उसकी सहयोगी पार्टी बीजेपी को 102 सीटों पर विजय हासिल हुई थी। दूसरी तरफ लालू यादव की पार्टी आरजेडी को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था, पार्टी को सिर्फ 22 सीटें हासिल हुई थीं, उसको साल 2005 के मुकाबले 32 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था।
साल 2015 में बदले चुनावी समीकरण
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। जिससे नाराज नीतीश कुमार ने एनडीए से नाता तोड़ लिया और साल 2015 का विधानसभा चुनाव उन्होंने आरजेडी यानी महागठबंधन के साथ लड़ा था। इस बार बहुमत महागठबंधन को मिला और लगातार तीसरी बार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।
साल 2015 में बदल गया था चुनावी मुद्दा
2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहे थे, लिहाजा इस बार चुनावी मुद्दे बदल गए। इस बार नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर चुनावी रण में उतरे थे। विकास और सुशासन बाबू की छवि बना चुके नीतीश कुमार और एमवाई समीकरण को साधने वाले लालू यादव एकजुट हो गए थे। लिहाजा इस बार इन दोनों मुद्दों ने असर दिखाया और जीत महागठबंधन की हुई।
साल 2020 में बीजेपी के साथ लड़े नीतीश
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक लड़ाई की तस्वीर और चुनावी मुद्दे दोनों बदल चुके थे। नीतीश कुमार एनडीए में शामिल हो चुके थे और एक बार उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। जीत एनडीए के खाते में आई और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने।
साल 2025 के चुनावी मुद्दे
इस बार जब बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो चुनावी मुद्दे पूरी तरह बदले हुए हैं। एनडीए बिहार को आईटी हब, हाईटेक सिटी और तेज गति से विकास का सपना दिखा रही है। दूसरी तरफ कानून व्यवस्था, नौकरी और पलायन के मुद्दे को लेकर महागठबंधन चुनाव मैदान में उतर चुका है। महागठबंधन, खास तौर पर तेजस्वी यादव के ये वही तीनों मुद्दे हैं, जिसे साल 2005 के विधानसभा चुनाव में उठाकर नीतीश कुमार सूबे की सत्ता पर पहली बार काबिज हुए थे।