बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। तमाम राजनीतिक दल और उसके दिग्गज नेता इसकी तैयारियों में जुटे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस सांसद राहुल गांधी तक ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन इन सबके बीच एक नाम जो बिहार की सियासत में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है वो कोई और नहीं बल्कि लालू यादव के छोटे बेटे और बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का है। महागठबंधन ने इस बार बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर महागठबंधन ने तेजस्वी के नाम पर ही दांव क्यों लगाया? साथ आपको बताएंगे की तेजस्वी यादव का अब तक राजनीतिक करियर कैसा रहा और क्यों विपक्ष इस बार तेजस्वी के भरोसे बिहार चुनाव में एनडीए को पटखनी देने की योजना बना रहा है?
कैसे हुई तेजस्वी के राजनीतिक करियर की शुरुआत?
तेजस्वी यादव का जन्म 9 नवंब6र 1989 को बिहार के गोपालगंज में लालू प्रसाद यादव के परिवार में हुआ। वैसे तो तेजस्वी यादव को सियासत विरासत में मिली थी। उनके पिता लालू यादव उस समय बिहार की राजनीति में एक बड़ा नाम थे। लेकिन बावजूद इसके तेजस्वी यादव ने शुरूआत में राजनीति के बजाय क्रिकेट को अपने करियर ऑपशन के तौर पर चुना। यही वजह रही की तेजस्वी को अपनी पढ़ाई तक बीच में छोड़ने पड़ी। जिसे लेकर आज विपक्षी नेता उनपर तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
तेजस्वी की राजनीतिक सफलता
हालांकि, क्रिकेट में तेजस्वी यादव ज्यादा दिन तक कुछ खास कर नहीं पाए। लिहाजा उन्होंने पॉलिटिक्स में लौटने की सोची। साल 2010 से ही तेजस्वी राष्ट्रीय जनता दल के लिए प्रचार करने लगे थे। इसके बाद साल 2013 के खत्म होते-होते उन्होंने पूरी तरह से क्रिकेट को अलविदा कहकर राजनीति में ध्यान देना शुरू कर दिया। फिर साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हो गए। उन्होंने परिवार की राजनीति सियासत को आगे बढ़ाते हुए राघोपुर विधानसभा सीट से पर्चा भरा। तेजस्वी ने अपने पहले ही चुनाव में जीत हासिल की और विधानसभा पहुंचे। इतना ही नहीं चुनाव में जीत के साथ ही तेजस्वी ने गठबंधन सरकार में राज्य के डिप्टी सीएम का पद भी संभाला। यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि रही।
तेजस्वी दूसरी बार बने डिप्टी सीएम
हांलाकि, 2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजद के साथ गठबंधन तोड़ दिया और उन्होंने एनडीए के साथ मिलकर सरकार बना ली। इसके साथ ही तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 2020 में तेजस्वी ने राजद को लीड करते हुए चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 75 सीटों पर जीत हासिल की। राजद इस चुनाव में अकेले अपने दम पर सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन यह सरकार बनाने के लिए काफी नहीं थी। इसके बाद फिर से बिहार की सियासत में बड़ा उलटफेर हुआ और तेजस्वी यादव 2022 से 2024 तक दूसरी बार उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन एक बार फिर से नीतीश कुमार ने पलटी मारी और 2024 में उन्होंने राजद के साथ गठबंधन तोड़ एनडीए का दामन थाम लिया।
तेजस्वी यादव के सामने चुनौतियां
निःसंदेह तेजस्वी यादव इस मौजूदा समय में बिहार की सियासत का एक बड़ा चेहरा जरूर बन चुके हैं। इसके साथ ही उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं। तेजस्वी की राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। विपक्ष गाहे-बगाहे उनकी 9वीं कक्षा तक की पढ़ाई को लेकर उनपर निशाना साधता रहता है। इसके अलावा रेलवे भर्ती और जमीन घोटाले से जुड़े मामलों ने तेजस्वी और उनके परिवार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इन सबसे बड़ा आरोप तेजस्वी के पिता और माता यानी लालू यादव और राबड़ी देवी के राज के जंगलराज को लेकर उनपर एनडीए हमेशा हमलावर रहा है।
"तेजस्वी प्रण पत्र" से बनेगी बात?
इन तमाम विषमताओं के बावजूद महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। तेजस्वी यादव कई चुनावी वायदे जैसे "एक परिवार एक सरकारी नौकरी" को लेकर जहां एक तरफ विपक्ष हवा महिला बता रहा है, वहीं बिहार का युवा इसे बड़ी उम्मीद से देख रहा है। तेजस्वी यादव बिहार के युवाओं के बीच खासा फेमस हैं और साथ ही दलित और पिछड़े वर्गों में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
अब देखना होगा कि तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा चुनाव में क्या कमाल दिखा पाते हैं? क्या बिहार की जनता एक बार फिर से तेजस्वी यादव पर भरोसा दिखा पाएगी? इसका पता तो आने वाली 14 नवंबर को ही चलेगा जब बिहार चुनाव के रिजल्ट घोषित होंगे।