बिहार विधानसभा का चुनाव सिर्फ बिहार के लिए पूरे देश के लिए एक संदेश जैसा है। बिहार को हिन्दी पट्टी की राजनीति का थर्मामीटर कहा जाता है। जिसका असर पूरे देश पर पड़ना लाजमी है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या बिहार विधानसभा का चुनाव राजीति के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में होने वाले साल 2027 के विधानसभा चुनाव का संकेत देंगे। इससे बढ़कर क्या बिहार के नतीजे साल 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे। जिसमें प्रमुख विपक्षी गठबंधन यानी इंडिया गठबंधन या बिहार में महागठबंधन का क्या भविष्य होगा।
बिहार महागठबंधन के लिए अवसर और चुनौती
INDIA गठबंधन के लिए बिहार का चुनाव चुनौती और अवसर दोनों ही तरह की परीक्षा है। दरअसल महागठबंधन में शामिल पार्टियां आरजेडी, कांग्रेस, लेफ्ट और कुछ और छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के अपने अलग-अलग हित, एजेंडा और राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाली हैं। जो महागठबंधन की पार्टियों की एकजुटता के लिए कड़ी चुनौती है। लेकिन महागठबंधन के चुनावी वादों पर जनता की मुहर लगती नजर आती है तो वो सिर्फ जातीय समीकरण साधने में कामयाब नहीं होगा बल्कि उसके विकास के चुनावी एजेंडे पर भी मुहर लगेगी। इस तरह से ये चुनाव महागठबंधन के लिए अवसर भी है।
तेजस्वी यादव पर टिकी निगाहें
35 वर्षीय तेजस्वी यादव इस चुनाव में न सिर्फ़ आरजेडी, बल्कि पूरे INDIA गठबंधन के चेहरे बने। उनका वादा हर परिवार को एक सरकारी नौकरी और महिलाओं को आर्थिक सहायता इस चुनाव का केंद्र बना। तेजस्वी का मकसद था कि आरजेडी की छवि को पारंपरिक जातीय राजनीति से निकालकर रोजगार और सम्मान की राजनीति की ओर मोड़ा जाए। अगर नतीजे उनके पक्ष में रहे, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के युवा चेहरे के रूप में उभर सकते हैं। लेकिन अगर प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा, तो सवाल उठेंगे कि क्या गठबंधन का अभियान लोकलुभावन वादों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर था।
बिहार में विपक्षी एकता की अग्नि परीक्षा
महागठबंधन अपने गठन के बाद से कई मतभेदों से गुजरा है, सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व तक। बिहार में हालांकि, सहयोग उम्मीद से बेहतर नजर आया। आरजेडी के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव ने नेतृत्व किया, कांग्रेस ने समर्थन दिया और वाम दल साथ रहे। कुल मिलाकर अभियान का नारा रहा बिहार बनाम दिल्ली, जो स्थानीय अस्मिता और केंद्र के वर्चस्व के बीच संतुलन की कोशिश थी। अगर महागठबंधन का ये मॉडल सफल रहता है, तो ये अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है, एक मजबूत क्षेत्रीय नेता, साझा मुद्दे जैसे रोज़गार, संघीयता, सुशासन और देश की एकजुटता का संदेश लेकर आगे बढ़ सकते हैं।
जीत महागठबंन में फूंक देगी नई जान
अगर बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को जीत मिलती है और वो बिहार में सरकार बनाते हैं तो खास तौर पर आरजेडी और कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी सफलता होगी। जीतने पर पिछले साल 2024 में हुए लोकसभा में मिली मामूली सफलता को साल 2029 में और बड़ा करने की जमीन तैयार होगी। बिहार में जीत विपक्ष की साख बहाल कर सकती है, ये दिखाएगा कि एकजुट विपक्ष बीजेपी को हिंदी पट्टी में कड़ी चुनौती दे सकता है।
बंगाल में कांग्रेस को मिलेगा बल
बिहार में अगर महागठबंधन की जीत होती है तो ये कांग्रेस के लिए अगले साल मार्च अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए संजीवनी साबित होगी। बिहार में जीत का संदेश वो बंगाल में देने में कामयाब होंगे। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी महागठबंधन में शामिल करने के लिए राजी कर सकते हैं। जो अभी तक महागठबंधन में सिर्फ बंगाल से बाहर शामिल होती हैं। इस बार वैसे भी बंगाल में ममता की चुनौती पिछली बार के चुनाव से ज्यादा कठिन नजर आ रही है।
आरजेडी धो पाएगी जंगलराज का दाग?
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री का चेहरा हैं। ऐसे में बिहार में मिली कामयाबी सबसे बड़ी सफलता तेजस्वी यादव के लिए होगी। जिनके पीछे पड़ा लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगलराज का साया पीछा छोड़ देगा। वहीं 35 साल के तेजस्वी यादव के रूप में विपक्ष को एक युवा चेहरा मिल जाएगा।