
Bihar Assembly Election 2025: पुष्पम प्रिया चौधरी, बहन मायावती और अरविंद केजरीवाल- ये तीन अपनी-अपनी पार्टी के मुखिया है। इन तीनों की पार्टी के यही सर्वेसर्वा हैं और तीनों ने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। अब यहां दो सवाल उठते हैं। पहला ये कि इन तीनों पार्टियों को 243 उम्मीदवार मिलेंगे और दूसरा ये कि आखिर ये तीनों चुनाव की गहमा-गहमी के बीच गुमनाम क्यों हैं?
बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। 122 महिलाओं को टिकट देंगी। किसी भी खराब आचरण वाले इंसान को टिकट नहीं दिया जाएगा। द प्लुरल्स पार्टी के टिकट बेचे नहीं जा रहे हैं। पुष्पम प्रिया चौधरी इन्हें ही अपना एजेंडा बताती हैं। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जमकर प्रचार किया, लेकिन उनके हाथ कोई खास कामयाबी नहीं मिली। इस बार भी वो चुनाव प्रचार कर रही हैं और फिर मामला ढाक के तीन पात ही है। पुष्पम प्रिया चौधरी ने खुद को अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया हुआ है।
पुष्पम प्रिया चौधरी ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क से पढ़ाई की है। उन्होंने लंदन की यूनिवर्सिटी से एडमिनिस्ट्रेशन और पॉलिटिक्स में डिग्री हासिल किए हैं। इससे पहले पुष्पम ने सिम्बायोसिस इंटरनैशनल स्कूल से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की थीं। उनकी प्रारंभिक पढ़ाई बिहार से हुई है।
पुष्पम प्रिया ने 8 मार्च, 2020 को अपनी पार्टी TPP की स्थापना की थी और पूरे बिहार में मास्क पहनकर चुनाव प्रचार किया था। उनके चुनाव प्रचार का स्टाइल, उनका विजन और उनके आउटफिट्स वेस्टर्न स्टाइल के दिखते हैं। साल 2020 के चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कभी भी अपने मुंह से मास्क नहीं हटाया और अब भी यही सिलसिला जारी है। पिछली बार पुष्पम प्रिया ने बांकीपुर और बिस्फी, दो विधानसभा सीटों ने चुनाव लड़ा था और दोनों जगहों पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। लेकिन बिहार में मायावती के अभी तक एक भी चुनावी दौरे नहीं हुए हैं। हालांकि उनकी पार्टी का नारा 'जय भीम जय भारत' बिहार के चुनावी रंग में उभरता जरूर नजर आ रहा है। मायावती की पार्टी यूपी से सटे पश्चिमी बिहार पर विशेष ध्यान दे रही हैं। वजह है इन इलाकों में दलित और पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद।
बीएसपी भोजपुर, रोहतास, बक्सर, कैमूर, सासाराम में ज्यादा ध्यान दे रही है। हालांकि पूर्वी यूपी के दूसरे छोर से सटे सारण, सीवान और गोपालगंज जैसे जिलों में भी दलित वोटरों की अच्छी खासी संख्या है। इन इलाकों में मायावती की पार्टी बीएसपी के बैनर पोस्टर और झंडे तो जरूर नजर आ रहे हैं, लेकिन इन तीनों जिलों में एनडीए और महागठबंधन की बराबर पकड़ होने की वजह से बीएसपी की मौजूदगी न के बराबर नजर आती है।
साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में मायावती की पार्टी बीएसपी ने 80 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन जीत सिर्फ एक सीट पर मिली थी। कैमूर जिले के चैनपुर विधानसभा सीट से बीएसपी के जमा खान चुनाव जीते थे। उन्होंने बीजपी के पूर्व मंत्री रहे बृजकिशोर बिंद को 24 हजार वोटों से मात दी थी। जमा खान चुनाव जीतने के बाद जेडीयू में शामिल हो गए और पार्टी ने उन्हें नीतीश मंत्रिमंडल में भी शामिल किया।
भारतीय राजनीति की सनसनी कहे जाने वाले और 'मुफ्त की राजनीति' के जनक माने जाने वाले अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने भी बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। लेकिन पार्टी के पास बिहार में कैडर के नाम पर कुछ नहीं है। हालांकि पार्टी ने अपने 11 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है।
आम आदमी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की चुनौती से पहले सभी सीटों के लिए प्रत्याशी का चयन कम बड़ा चैलेंज नहीं है। लेकिन आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने के लिए पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। यही वजह है कि वो बिहार में पार्टी का संगठन नहीं होने के बावजूद सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ रही जमी-जमाई पार्टियां आम आदमी के लिए चुनाव प्रचार के दौरान दूसरी बड़ी चुनौती होंगी। पहली चुनौती अरविंद केजरीवाल की छवि होगी। दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथ से जा चुकी है। केजरीवाल ने खुद माना था कि दिल्ली की सड़कें, ट्रैफिक, वायु प्रदूषण, मैली यमुना, स्वास्थ्य और शिक्षा पर जिस तरह के वादे उन्होंने किए थे, वो पूरे नहीं हो पाए। ऊपर से 'शीशमहल' ने केजरीवाल की बड़ी किरकिरी कराई।
भ्रष्टाचार और घोटाले की संस्कृति के खिलाफ क्रांति से उपजी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल की सरकार में घोटालों के आरोपों की बौछार लग गई। दिल्ली में आबकारी, ट्रांसपोर्ट, क्साल रूम, स्वास्थ्य और यमुना सफाई घोटाले के आरोपों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं। ऐसे में बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के मन पर कितना और कैसा असर डाल पाएगी, इसका अंदाजा लगाना बहुत कठिन नहीं है।
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