तो क्या इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार का मुद्दा घूम-फिरकर मुसलमानों पर आ गई है? क्योंकि महागठबंधन को अगर बिहार में अपनी सरकार बनानी है तो उसके लिए मुस्लिम मतदाताओं को गठबंधन पर मेहरबान होना होगा। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में जंगलराज के खिलाफ आक्रोश ने नीतीश कुमार को सत्ता दिलाई। साल 2010 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार सुशासन के नाम पर जीते और 2015 में नीतीश का चेहरा और लालू यादव के माई समीकरण यानी मुस्लिम यादव के एकजुट वोट की मदद से नीतीश कुमार ने सत्ता पाई। साल 2020 में शराबबंदी, महिलाओं को निकाय चुनाव में आरक्षण और बुनियादी सुविधाओं के विकास के नाम पर नीतीश कुमार ने चुनाव जीते। लेकिन इस बार की लड़ाई में एक बार फिर मुस्लिम अहम हो गया है। वरना क्या वजह थी कि महागठबंधन की तरफ से डिप्टी सीएम का चेहरा मुकेश सहनी फिर से मुसलमानों को बीजेपी के नाम से डराते।
क्या मुसलमान तय करेगा बिहार की सरकार?
'MY' समीकरण और सामाजिक न्याय के नारे ने लालू परिवार को 15 साल तक बिहार में राज करने का मौका दिया। खासकर 'MY' यानी मुस्लिम यादव का एकमुश्त वोट आरजेडी के खाते में जाता रहा और आरजेडी सरकार बनाती और चलाती रही। अब यही 'MY' कार्ड तेजस्वी यादव से लेकर मुकेश सहनी तक खेलने लगे हैं। तेजस्वी यादव ने तो बाकायदा ऐलान कर दिया है कि उनकी सरकार बनने पर दो से तीन डिप्टी सीएम बन सकता है और इन तीन डिप्टी सीएम में एक उपमुख्यमंत्री अल्पसंख्यक वर्ग से हो सकता है। दरअसल ओवैसी का डर महागठबंधन और तेजस्वी को ये कार्ड खेलने पर मजबूर कर रहा है।
बीजेपी के नाम से मुसलमानों को डराने लगे सहनी!
VIP प्रमुख और महागठबंधन के उप-मुख्यमंत्री पद का चेहरा मुकेश सहनी ने सीधे-सीधे बीजेपी के नाम से मुसलमानों को डराने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि बीजेपी मुसलमानों को भारत से भगाना चाहती है। बीजेपी की नीति फूट डालो आर राज करो की रही है। बीजेपी भाई-भाई को आपस में लड़ाना चाहती है, लगे हाथ उन्होंने ये भी कहा कि मुसलमान भाई इतने मूर्ख नहीं हैं। मुकेश सहनी ने कहा कि हमलोग उन तमाम लोगों की राजनीति को मजबूती के साथ खत्म करेंगे जो देश के भाई-चारे को खत्म करना चाहते हैं। मुकेश सहनी का ये बयान साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान लालू यादव के बयान से एकदम मेल खाते हैं। जब लालू यादव कहते थे कि बीजेपी सांप्रदायिक पार्टी है और वो देश के भाईचारे को खत्म कर देगी।
महागठबंधन को ओवैसी की पार्टी से ज्यादा डर!
दरअसल महागठबंधन को बीजेपी से नहीं असली डर हैदराबाद वाले असदुद्दीन की पार्टी AIMIM से है। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार की तमाम पार्टियां ओवैसी के पार्टी का ट्रेलर देख चुकी हैं। महागठबंधन को असल चिंता इसी बात की है कि कहीं इस बार भी अगर मुसलमान ओवैसी भाईजान पर मेहरबान हुआ तो फिर वही मुसीबत झेलनी पड़ेगी। यही वजह है कि एक तरफ तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि उनकी सरकार आई तो बिहार से नए वक्फ संशोधन कानून को उखाड़कर फेंक देंगे। लेकिन राजनेताओं को तो छोड़ दीजिए सामान्य राजनीति की समझ रखने वाला इंसान भी ये जानता है कि जो बिल लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पास हो गया, उसपर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए और वो अब कानून का रूप ले चुका है उसे कोई भी राज्य सरकार नहीं हटा सकती।
AIMIM ने साल 2020 में जीती थी 5 सीटें
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी AIMIM ने बिहार की कुल 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। ये सभी उम्मीदवार नेपाल से लगती सीमांचल की मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़े थे और AIMIM ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। ये अलग बात है कि बाकि की 15 में से 14 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी और जीते हुए पांच में से चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे। लेकिन उस वक्त AIMIM ने तेजस्वी यादव का खेल खराब कर दिया था। यही वजह है कि तेजस्वी यादव से लेकर मुकेश सहनी तक बीजेपी के नाम पर मुसलमानों को डरा रहे हैं। दूसरी तरफ ओवैसी कह रहे हैं कि 18 प्रतिशत की आबादी होने के बावजूद मुसलमान सिर्फ दरी बिछाने के लिए रह गया है उसे कोई पार्टी उसका हिस्सा देने को तैयार नहीं है।