
पहले चरण में मतदान का फाइनल आंकड़ा चुनाव आयोग ने जारी कर दिया है, पहले चरण में बिहार में 65 प्रतिशत वोट पड़े। साल 2020 के मुकाबले करीब 9 प्रतिशत ज्यादा मतदान हुआ है। सत्ता पक्ष कह रहा है कि पहले चरण का बंपर मतदान उनके पक्ष में गया है क्यों कि बिहार में जब-जब मतदान प्रतिशत बढ़ा है एनडीए को भारी जनादेश मिला है। दूसरी तरफ महागठबंधन की तरफ से कहा जा रहा है कि मतदान प्रतिशत के बढ़ने का सीधा मतलब होता है सत्ता परिवर्तन। इसी बीच प्रशांत किशोर की अपनी दलीलें हैं। मतदान प्रतिशत बढ़ने के कुछ और कारण भी हो सकते हैं। बिहार में SIR यानी मतदाता सूची की गहन जांच और छठ में आए प्रवासी मजदूरों के मतदान की भी इसमें अहम भूमिका हो सकती है।
बिहार में राजनीतिक दलों के दावे और बंपर वोटिंग की वजहों पर चर्चा करेंगे, लेकिन उससे पहले जान लेते हैं पहले चरण में सभी 18 जिलों के वोट प्रतिशत। पहले चरण में सबसे ज्यादा मतदान मुजफ्फरपुर जिले में हुआ यहां 70.96 प्रतिशत मतदान हुए यानी करीब 71 प्रतिशत जो पहले चरण में सबसे ज्यादा है। दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा वोटिंग समस्तीपुर जिले में हुई जहां वोट प्रतिशत रहा 70.63 प्रतिशत। उसके बाद नंबर आता है बेगूसराय कहा जहां 69.87 प्रतिशत मतदान हुआ। खगड़िया में 67.90 प्रतिशत, गोपालगंज में 66.64 प्रतिशत, लखीसराय में 62.76 प्रतिशत, छपरा में 60.90 प्रतिशत, खगड़िया में 60.65 प्रतिशत, दरभंगा में 58.38 प्रतिशत, नालंदा में 57.58 प्रतिशत, सीवान में 57.41 प्रतिशत, बक्सर में 55.10 प्रतिशत वोट पड़े।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 6 नवंबर को 121 सीटों पर हुए कुल मतदान का फाइनल आंकड़ा चुनाव आयोग ने जारी कर दिया है। जिसके मुताबिक पहले चरण में 65.08 प्रतिशत मतदान हुआ है। जबकि साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में 57.05 प्रतिशत वोट पड़े थे। वहीं साल 2015 के विधानसभा चुनाव में 56.66 प्रतिशत वोट पड़े थे। साल 2010 में 52.73 प्रतिशत, साल 2005 में फरवारी में हुए विधानसभा चुनाव में 46.50 प्रतिशत, साल 2005 अक्टूबर 2005 में 45.85 प्रतिशत और साल 2000 में 62.57 प्रतिशत वोट डाले गए।
बिहार में पहली बार विधानसभा चुनाव 1951 में हुए थे तब से लेकर झारखंड अलग होने से पहले कुल 12 बार विधानसभा चुनाव हुए। 1051 में पहली बार हुए विधानसभा चुनाव में 42.6 प्रतिशत वोट पड़े थे। साल 1957 में 43.24 प्रतिशत, 1962 में 44.47 प्रतिशत, 1967 में 51.51 प्रतिशत, 1969 में 52.79 प्रतिशत, 1972 में 52.79 प्रतिशत, 1977 में 57.70 प्रतिशत, 1980 में 57.7 प्रतिशत, 1985 में 56.51 प्रतिशत, 1990 में 60.04 प्रतिशत, 1995 में 61.79 प्रतिशत, और साल 2000 में झारखंड अलग होने से पहले हुए विधानसभा चुनाव में 62.57 प्रतिशत मतदान हुए। इस तरह से देखा जाए तो साल 2025 में इस बाहर पहले चरण में हुआ मतदान प्रतिशत बिहार में हुए सभी विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक है।
बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एनडीए ने महिलाओं को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये दिए गए। बिहार की करीब एक करोड़ महिलाओं को 10-10 हजार रुपये दिए गए और चुनाव के बाद रोजगार चलने पर और दो लाख रुपये देने की बात कही गई है। एक करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने की घोषणा की गई है। सफल महिला उद्यमियों को करोड़पति बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
महागठबंधन ने भी बिहार विधानसभा चुनाव में महिला वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए कई चुनावी वादे किए हैं। जिसमें सबसे प्रमुख है जीविका दीदियों को 30 हजार रुपये प्रति महीने वेतन देना। इसके अलावा माई बहिन योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रह रही हर महिलाओं को 2500 रुपये प्रति महीना आर्थिक मदद देना शामिल है। सरकारी नौकरी में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा महागठबंधन की तरफ से किया गया है।
बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एनडीए ने महिलाओं को रोजगार के लिए 10 हजार रुपये दिए गए। बिहार की करीब एक करोड़ महिलाओं को 10-10 हजार रुपये दिए गए और चुनाव के बाद रोजगार चलने पर और दो लाख रुपये देने की बात कही गई है। एक करोड़ महिलाओं को लखपति दीदी बनाने की घोषणा की गई है। सफल महिला उद्यमियों को करोड़पति बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
महागठबंधन ने भी बिहार विधानसभा चुनाव में महिला वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए कई चुनावी वादे किए हैं। जिसमें सबसे प्रमुख है जीविका दीदियों को 30 हजार रुपये प्रति महीने वेतन देना। इसके अलावा माई बहिन योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रह रही हर महिलाओं को 2500 रुपये प्रति महीना आर्थिक मदद देना शामिल है। सरकारी नौकरी में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा महागठबंधन की तरफ से किया गया है।
बिहार में इस बार पहले चरण में ऐतिहासिक बंपर वोटिंग हुई है। विभाजित बिहार में यानी झारखंड अलग होने के बाद बिहार में जब भी महिलाओं के वोट प्रतिशत ज्यादा रहे हैं नीतीश कुमार और एनडीए को फायदा हुआ है। साल 2010 में पहली बार बिहार में महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा मतदान किया। साल 2010 में 54.49 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया था, जिसके मुकाबले 51.12 प्रतिशत पुरुषों के वोट पड़े। साल 2015 में 60.48 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया जिसके मुकाबले 53.32 प्रतिशत पुरुषों ने वोट डाले। साल 2020 में 59.69 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले जबकि 54.49 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया। इस लिहाज से देखें तो जब-जब महिलाओं का वोट प्रतिशत बढ़ा तब तब नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार को बहुमत मिला।
नीतीश कुमार ने साल 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जो सबसे बड़ी लोक लुभावन योजना लागू की वो थी मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना। जिसके तहत हाई स्कूल में पढ़ने वाली हर बालिका को सरकार की तरफ से साइकिल दी गई और नीतीश कुमार को इसका लाभ साल 2010 के विधानसभा चुनाव में मिला। 2013-14 में नीतीश कुमार ने पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की और इसका लाभ साल 2015 के विधानसभा चुनाव में मिला। साल 2016 में नीतीश कुमार ने पूरे बिहार में संपूर्ण शराबबंदी लागू की और इसका फायदा उन्हें साल 2020 के विधानसभा चुनाव में बंपर महिला मतदान के रूप में मिला।
पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही जनसुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर का बंपर वोटिंग को लेकर अलग दावा है। मीडिया के सामने प्रशांत किशोर ने कहा कि इस बार बंपर वोटिंग तीसरे विकल्प यानी जनसुराज के पक्ष में देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि पिछले 35 साल से बिहार का कायाकल्प करने के वाली पार्टी का विकल्प जनता के सामने मौजूद नहीं था। इस बार जनसुराज उस कमी को पूरा कर रही है। यही वजह है कि बिहार में बंपर वोटिंग जनसुराज के पक्ष में हो रहा है। उन्होंने इस बार महिलाओं से ज्यादा बड़ा फैक्टर प्रवासी मजदूरों के मतदान को बताया है।
बिहार में हो रही बंपर वोटिंग को तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं। एनडीए और महागठबंधन की अपनी-अपनी घोषणाएं हैं इन दोनों की घोषणा के असर से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन वोटिंग प्रतिशत बढ़ने की एक बड़ी वजह चुनाव आयोग के SIR को भी माना जा रहा है। बिहार में गहन मतदाता जांच के बाद वोटर लिस्ट को शुद्ध किया गया जिसके तहत 68 लाख 66 हजार नाम मतदाता सूची से हटाए गए। जबकि 21.53 लाख नए मतदाता जोड़े गए, जिसके बाद बिहार में कुल 7 करोड़ 42 लाख मतदाता हैं। माना जा रहा है कि SIR के बाद मतदाताओं में मतदान को लेकर जागरुकता बढ़ी है। वहीं छठ के तुरंत बाद होने वाली वोटिंग को भी बढ़े हुए मतदान प्रतिशत की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। छठ पूजा में घर पहुंचे प्रवासी मजदूरों ने भी पहले चरण में बढ़-चढ़कर मतदान किया।
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