
बिहार विधानसभा चुनाव के मैदान में आरजेडी एक बार फिर अपने 20 साल पुराने फॉर्म्यूले पर लौट आई है। महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा तेजस्वी यादव ने सत्ता में आते ही वफ्फ कानून को बिहार से उखाड़कर फेंक देने की बात कही है। दूसरी तरफ हैदराबाद वाले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को वोट कटवा बताकर मुसलमानों को फिर से एकजुट अपने वाले में करने की कोशिश शुरू कर दी है। यानी कुल मिलाकर मुस्लिम यादव को एकजुट अपने वाले में करने के लिए तेजस्वी यादव ने दांव चल दिया है।
आरजेडी के एमएलसी ने एक चुनावी जनसभा में तेजस्वी यादव की सरकार बनते ही बिहार से नए वक्फ कानून को उखाड़कर फेकने का दावा किया था। इसे लेकर खूब बवाल मचा। विपक्ष की तरफ से इसको लेकर अभी हंगामा शुरू ही हुआ था कि तेजस्वी यादव ने खुद चुनावी मंच से वक्फ कानून को उखाड़ फेंकने की बात दुहरा दी। बस क्या था, अब बिहार में विधानसभा का चुनाव वक्फ कानून की धुरी पर घूमता नजर आने लगा है। एनडीए इसे आरजेडी का पुराना पुष्टिकरण वाला मुद्दा बता रहा है तो असदुद्दीन ओवैसी इसे मुसलमानों को ठगने के लिए दिया गया बयान बता रहे हैं।
एमवाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादवों का एकजुट वोट हासिल कर सरकार बनाने की परंपरा बिहार में लालू यादव ने शुरू की थी। बीच में नीतीश कुमार ने बड़ी बारीकी से पसमांदा का दांव चलकर मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई थी। इसका नतीजा हुआ कि बीजेपी के साथ गठबंधन के बावजूद नीतीश को मुसलमानों के वोट मिलते रहे और वो जीतते रहे। लेकिन पिछली बार नीतीश की ये चाल बेअसर साबित हुई थी और औवैसी की पार्टी ने बिहार में उम्मीद से बढ़कर प्रदर्शन किया था। अब मुस्लिम वोटों को एकजुट अपने पाले में करने के लिए तेजस्वी ने पिता लालू यादव वाली चाल चल दी है।
मुस्लिमों का वोट हासिल करने के लिए जरूरी है कि जो उनका सबसे बड़ा रहनु्मा होने का दावा करता हो, उसपर चोट किया जाए। तेजस्वी यादव ने भी कुछ ऐसा ही किया, एक तरफ चुनावी मंच से केंद्र सरकार के बनाए नए वक्फ कानून को बिहार से उखाड़कर फेंकने की बात कही तो दूसरी तरफ ओवैसी की पार्टी AIMIM को वोट कटवा पार्टी करार दिया। इतना ही नहीं, तेजस्वी ने मुस्लिम उप-मुख्यमंत्री वाला बयान देकर नया सियासी राग छेड़ दिया है। मतलब बिहार में अब एक बार फिर मुस्लिम वोट बैंक सत्ता की चाबी बनता नजर आने लगा है।
जब तेजस्वी यादव ने ओवैसी पर वार किया तो उनकी तरफ से पलटवार करना लाजमी था, सो उन्होंने भी मुस्लिमों को रिझाने वाला अपना पुराना दाव खेला। ओवैसी ने कहा कि हर पार्टी मुस्लिमों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है आज तक बिहर की सियासत में किसी ने मुसलमानों को उसका हक नहीं दिया। ओवैसी ने कहा कि दो प्रतिशत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा बनाया गया है, लेकिन किसी भी पार्टी ने ये नहीं कहा कि वो मुस्लिम को डिप्टी सीएम का पद देगी।
क्रिकेट का मैदान छोड़ पिछले 10 साल से राजनीति की पिच पर बैटिंग कर रहे तेजस्वी यादव को सियासी दाव पेंच का अंदाजा था। लिहाजा उन्होंने पहले ही मौके की नजाकत को भांपते हुए जीतने के बाद मुस्लिम डिप्टी सीएम बनाने का सियासी तुर्रा फेंक दिया। इसके बाद महागठबंधन के चुनाव जीतने की स्थिति में तीन-तीन डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चा जोर पकड़ने लगी। जाहिर है जब मुकेश सहनी और एक मुस्लिम चेहरा डिप्टी सीएम होगा तो कांग्रेस की तरफ से भी डिप्टी सीएम की सीट पर दावा ठोका जाएगा।
पिछली बार भले ही मुस्लिमों ने नीतीश कुमार को वोट नहीं दिया था, लेकिन वो वोट महागठबंधन को भी नहीं मिले थे। बल्कि जेडीयू और आरजेडी दोनों दलों के कटे मुस्लिम वोट हैदराबाद वाले ओवैसी साहब की पार्टी AIMIM को मिले थे और सीमांचल में उनके 5 प्रत्याशी जीतकर विधायक बने, ये अलग बात है कि उन पांच में से चार विधायक बाद में आरजेडी में शामिल हो गए थे। तेजस्वी यादव मुस्लिम बहुल इसी सीमांचल इलाके में आरजेडी की कमजोर हुई पकड़ को फिर से मजबूत करना चाहते हैं।
नेपाल सीमा से सटे बिहार के सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और अररिया में 24 विधानसभा सीटें। इन चारों जिलों की सभी 24 विधानसभा सीटों पर 40 प्रतिशत से लेकर 68 प्रतिशत तक मुस्लिम वोट है और यही वोट यहां राजनीतिक दलों की किस्मत का फैसला करते हैं। पिछली बार नीतीश कुमार ने कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे लेकिन उनकी पार्टी का कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीत सका। इसके बावजूद सीमांचल की 24 विधानसभा सीटों में से 12 सीटों पर एनडीए गठबंधन ने जीत हासिल की थी। आरजेडी के खाते में 7 सीटें गईं जबकि AIMIM ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की। यही वजह है कि इस बार तेजस्वी यादव ओवैसी की पार्टी AIMIM को वोट कटवा पार्टी बता रहे हैं।
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