हुकूमत हासिल करने की ख्वाहिश में मजबूरियों की माला पहननी पड़े या फिर इसके लिए किसी के साथ गलबहियां करनी पड़े। इससे न तो गुरेज है और न ही कोई रत्ती भर फर्क पड़ता है। वरना आखिर क्या वजह है कि पिछले 20 साल से देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी, बिहार में जेडीयू की पिछलग्गू बनी हुई है और वो भी तक जब पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दम भरती हो। जिसके पास सबसे ज्यादा कार्यकर्ता हों। अब सवाल ये उठता है कि क्या इस बार बिहार में बीजेपी का 20 साल पुराना सपना पूरा होने जा रहा है।
क्या बिहार में पूरा होगा बीजेपी का सपना?
बिहार विधानसभा चुनाव के वोट डालने के गिनती भर के दिन बचे हैं, बीजेपी चुनावी मैदान में एकबार फिर कमर कसकर कूद चुकी है। लेकिन देश की इस सबसे बड़ी पार्टी और केंद्र में सत्ताधारी ये पार्टी बिहार में सब कुछ होते हुए भी लाचार हो जाती है, जबकि बिहार में बीजेपी का अपना जनाधार और संगठन है। लेकिन सुशासन बाबू नीतीश की छत्रछाया में रहने की ऐसी मजबूरी है कि इससे बाहर वो सोच नहीं पा रही है। ये सवाल बीजेपी के हर कट्टर नेता, कार्यकर्ता और समर्थकों की तरफ से उठाया जाता रहा है। साल 2020 में भी एनडीए की जीत में बड़ा भाई बनकर उभरी बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था, तब भी सवाल उठे थे कि बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया।
विपक्ष के नीतीश कुमार को लेकर दावे
क्या इस बार बिहार में बीजेपी का होगा मुख्यमंत्री? साल 2025 के विधानसभा चुनाव में इस बार ये बयान एनडीए या बीजेपी की तरफ से नहीं उठ रहा है, बल्कि ये अंदेशा सूबे की प्रमुख विपक्षी पार्टी आरजेडी जता रही है। तेजस्वी यादव अपने हर चुनावी मंच से कह रहे हैं कि बीजेपी ने नीतीश चाचा को हाईजैक कर लिया है और वो इस बार उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाएंगे। 2005 में जब लालू-राबड़ी के शासन के बाद बीजेपी-जेडीयू का शासन आया तब से लेकर आज तक बीजेपी समझौता करती आई है। पिछले दो दशक में यही दिखाई पड़ा है। अकेले नीतीश कुमार सब पर भारी दिखाई देते हैं। पिछले दो दशक में जीतनराम मांझी को छोड़ दिया जाए तो मुख्यमंत्री सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार ही बने। गठबंधन बदलते रहे लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बदला।
किंगमेकर और किंग दोनों बने रहे नीतीश
साल 2015 में नीतीश ने आरजेडी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, उनकी पार्टी लड़खड़ा गई थी। लेकिन उस वक्त भी किंगमेकर नीतीश कुमार ही थे लिहाजा किंग भी वही बने। बिहार में पिछले 20 साल में चार बार ऐसे मौके आए जब नीतीश कुमार ने अपना पाला बदला लेकिन उनकी कुर्सी नहीं बदली। नीतीश कुमार इस बार के चुनाव में बार-बार बोल रहे हैं कि वो अब कहीं नहीं जाएंगे। जिससे पुरानी दोस्ती की है उसी को निभाएंगे।
बिहार में बीजेपी नहीं खड़ा कर पाई चेहरा
अमूमन क्षेत्रीय पार्टियों में देखने को मिलता है कि वो एक परिवार या एक जाति की पार्टी होती है और पार्टी की विरासत उसी राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी बढ़ाती है। क्षेत्रीय पार्टियां अपने परिवार से बाहर अपनी पार्टी में या किसी दूसरी पार्टी में कोई चेहरा बड़ा नहीं होने देते। लालू यादव इसका साक्षात उदाहरण हैं, इनके साथ नीतीश का भी नाम लिया जा सकता है। जेडीयू में जितने बड़े नेता हैं वो नीतीश कुमार की छत्रछाया में पले बढ़े और राजनीतिक सुख भोग रहे हैं। एक बार जीतनराम मांझी ने बगावत किया था और नतीजा सबके सामने है। बिहार में बीजेपी अलग पार्टी रहते हुए भी उसकी मजबूरी भी क्षेत्रीय पार्टी की तरह रही। पार्टी में सुशील कुमार मोदी से लेकर सम्राट चौधरी तक सब नीतीश की छत्रछाया में राजनीति करते रहे। लिहाजा मजबूत संगठन होने के बावजूद गठबंधन टूटने का डर कहें या सत्ता से बाहर होने की आशंका, बीजेपी कोई अपना नेता नहीं खड़ा कर पाई।
बीजेपी-जेडीयू बराबरी पर लड़ रहे चुनाव
इस बार बीजेपी और जेडीयू 101-101 सीट पर चुनाव लड़ी रही है। इससे पहले तकरीबन हर बार जेडीयू बिहार में बड़े भाई की भूमिका में रही है। हमेशा विधानसभा चुनाव में वो बीजेपी से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती आई है। लेकिन इस बार बराबरी का सीट बटवारा हुआ है। यही वजह है कि एनडीए की जीत की स्थिति में इस बीजेपी के मुख्यमंत्री की चर्चा विपक्ष ज्यादा कर रहा है।
बेदखल या दरकिनार करें?
अगर एनडीए बिहार चुनाव के बाद फिर सत्ता में आती है तो देखना यही दिलचस्प होगा कि आखिर भाजपा के लिए क्या कुछ बदलता है? क्योंकि सौ बात कि एक बात तो यही है कि बीजेपी शासन में रहकर भी ऐसा लगता है कि वह सत्ता से दूर हैं। नीतीश कुमार की मौजूदगी में उसका वजूद उतना नहीं दिखता, सारी सुर्खियां नीतीश कुमार ही बटोर लेते हैं। इन सबसे इतर गठबंधन धर्म निभाने की मजबूरियों को किसी भी स्थिति में दरकिनार नहीं किया जा सकता है।