
बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले इलेक्शन कमीशन ने SIR यानी विशेष गहन निरीक्षण के तहत 69 लाख मतदाताओं के मतदाता सूची से बाहर कर दिया है। इसमें बिहार छोड़कर दूसरे राज्यों या विदेशों में बसे लोगों के नाम हैं। इसके अलावा जिनका निधन हो चुका है और जो विदेशी लोग थे जो अवैध रूप से मतदाता बन गए थे उनके नाम हटाए गए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने करीब 21 लाख नए नाम भी जोड़े हैं। SIR होने के बाद करीब 48 लाख मतदाताओं की कमी आई है। ऐसे में महिला मतदाताओं की भूमिका इस बार और भी अहम हो जाती है।
बिहार चुनाव के पहले चरण में 7 लाख 36 हजार 356 युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। लेकिन प्रत्याशियों की हार-जीत का फैसला 1 करोड़ 76 लाख महिलाओं के हाथ में होगा। इसका प्रमुख कारण है, पिछले 15 वर्षों से पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान प्रतिशत ज्यादा होना है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2015 के चुनाव में 53.32 प्रतिशत पुरुषों ने मतदान किया था, जिसके मुकाबले महिलाओं के मतदान का प्रतिशत 60.48 रहा था। इस हिसाब से साल 2015 में पुरुषों के मुकाबले 7.16 प्रतिशत महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया।
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा मतदान किया था। पिछले विधानसभा चुनाव में 54.45 प्रतिशत पुरुषों ने मतदान किया था। जिसके मुकाबले महिलाओं ने 56.69 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाले थे। मतलब इस बार पुरुषों के मुकाबले करीब दो प्रतिशत ज्यादा महिलाओं ने वोट डाले। इस बार भी चुनाव आयोग ने महिला मतदाताओं को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाया है।
जीविका समूह, आंगनबाड़ी, सेविका सहायिकाओं और आशा कार्यकर्ताओं की मदद से चुनाव आयोग ने महिलाओं को मतदान के प्रति जागरुक कर रहा है। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की तरफ से भी महिला मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। महागठबंधन और एनडीए की तरफ से महिलाओं को लेकर की गई तमाम चुनावी घोषणाएं इसका जीता जागता उदाहरण है। ताकि छठ के बाद दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले पुरुषों के काम पर लौटने की स्थिति में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं का वोट अपने पाले में किया जा सके।
सत्ताधारी पार्टी एनडीए की बात करें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुजुर्ग और विधवा पेंशन बढ़ा दिया है। डोमिसाइल नीति के तहत बिहार की सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत स्थानीय महिलाओं की भागीदारी की घोषणा की है। सहायिका, आशा कार्यकर्ताओं, जीविका दीदियों का मानदेय बढ़ा दिया है। दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने महिलाओं को 2500 रुपये प्रति महीना देने की घोषणा की है। जीविका दीदियों का वेतन 30,000 करने का ऐलान किया है। इसके अलावा मां योजना के तहत भी कई योजनाओं का ऐलान किया है। दरअसल बिहार में बड़ी संख्या में परुषों के रोजगार के लिए पलायन की वजह से भी महिला मतदाताओं का वोटिंग पैटर्न पुरुषों के मुकाबले ज्यादा रहा है।
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