FPI Outflow: मार्च के 15 दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने निकाले 52 हजार करोड़, जानें बाजार में क्यों मची है भगदड़?

FPI Outflow: मार्च के पहले पखवाड़े में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 52,704 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है।

Priya Shandilya
पब्लिश्ड15 Mar 2026, 06:13 PM IST
मार्च के 15 दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने निकाले 52 हजार करोड़, जानें बाजार में क्यों मची है भगदड़?
मार्च के 15 दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने निकाले 52 हजार करोड़, जानें बाजार में क्यों मची है भगदड़?

FPI Outflow: भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और इसके पीछे विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी अहम वजह बन रही हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने मार्च के पहले पखवाड़े में भारतीय शेयर बाजार से 52,704 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं।

बताया जा रहा है कि वैश्विक हालात, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। इसी वजह से उन्होंने भारतीय बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया।

फरवरी में आया था बड़ा निवेश

दिलचस्प बात यह है कि फरवरी महीने में स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस समय विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था। यह करीब 17 महीनों में सबसे बड़ा निवेश प्रवाह माना गया था।

हालांकि उससे पहले एफपीआई लगातार तीन महीने तक भारतीय बाजार से पैसा निकालते रहे थे। आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में 35,962 करोड़ रुपये, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपये और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपये की निकासी हुई थी।

मार्च में अब तक कितनी निकासी हुई

डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार 13 मार्च तक विदेशी निवेशकों ने लगभग 52,704 करोड़ रुपये की निकासी कर ली है। इससे साफ संकेत मिलता है कि मार्च के शुरुआती दिनों में ही विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार के प्रति थोड़ा सतर्क नजर आ रहा है।

क्यों भाग रहे हैं विदेशी निवेशक?

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि एफपीआई की निकासी के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। एंजल वन के वरिष्ठ विश्लेषक वकारजावेद खान के अनुसार, इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित लंबे संघर्ष की आशंका से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।

इसके साथ ही भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर लगभग 92 रुपये प्रति डॉलर के आसपास बना हुआ है। वहीं बॉन्ड प्रतिफल बढ़ने के कारण भी विदेशी निवेशक फिलहाल बिकवाली कर रहे हैं।

वैश्विक हालात का भी असर

जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी. के. विजयकुमार का भी मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों का भारतीय बाजार पर असर पड़ रहा है। उनके मुताबिक पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है। साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और रुपये की कमजोरी से भारत की आर्थिक वृद्धि और कंपनियों की कमाई पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।

चीन और ताइवान की तरफ बढ़ रहा झुकाव

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पिछले करीब 18 महीनों में विकसित और कुछ उभरते बाजारों के मुकाबले भारत से मिलने वाला रिटर्न थोड़ा कमजोर रहा है। इसी वजह से कई विदेशी निवेशक फिलहाल दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन जैसे बाजारों को ज्यादा आकर्षक मान रहे हैं और वहां निवेश के अवसर तलाश रहे हैं।

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