
FPI Outflow: दुनिया में जब भी भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, उसका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता बल्कि वित्तीय बाजारों पर भी साफ दिखाई देता है। इन दिनों पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है और इसका असर भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिल रहा है।
इसी बीच विदेशी निवेशकों ने पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में भारतीय इक्विटी बाजार से बड़ी रकम निकाल ली है, जिससे बाजार में हलचल बढ़ गई है।
डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने 2 मार्च से 6 मार्च के बीच भारतीय इक्विटी बाजार से करीब 21,000 करोड़ रुपये निकाल लिए। यह निकासी मुख्य रूप से कैश मार्केट में हुई, जहां विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर शेयरों की बिक्री की।
गौर करने वाली बात यह भी है कि 3 मार्च को होली के कारण शेयर बाजार बंद था, फिर भी बाकी चार कारोबारी सत्रों में इतनी बड़ी निकासी दर्ज की गई।
दिलचस्प बात यह है कि इससे ठीक पहले फरवरी महीने में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में जबरदस्त निवेश किया था। फरवरी के दौरान FPIs ने भारतीय इक्विटी में करीब 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया। यह पिछले 17 महीनों में सबसे बड़ी मासिक खरीदारी मानी गई थी। यानी फरवरी में जहां विदेशी निवेशकों ने बाजार में पैसा डाला, वहीं मार्च की शुरुआत में अचानक बिकवाली देखने को मिली।
फरवरी की खरीदारी से पहले विदेशी निवेशक लगातार तीन महीनों तक भारतीय बाजार से पैसा निकालते रहे थे।
आंकड़ों के अनुसार
इससे साफ है कि विदेशी निवेशकों का रुख पिछले कुछ महीनों से काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस ताजा बिकवाली के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। एंजेल वन के वरिष्ठ बुनियादी विश्लेषक वकारजावेद खान के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान की आशंका ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। इस डर के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई, जिससे निवेशकों के बीच जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ गई।
जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तो बड़े निवेशक आमतौर पर जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाने लगते हैं। ऐसे समय में कई विदेशी निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर भारतीय शेयर बाजार में भी दिखाई देने लगता है।
विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसा निकालना यह संकेत देता है कि वे फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में हैं। भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन ग्लोबल संकट की आंच से कोई भी अछूता नहीं रहता। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ और तेल की कीमतें ऐसे ही बढ़ती रहीं, तो आने वाले दिनों में बाजार में और भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
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