IPO: भारत का आईपीओ मार्केट सुनहरे दौर से गुजर रहा है। साल 2025 भारत के IPO बाजार के लिए अब तक का सबसे बड़ा साल बन गया है। आईपीओ के जरिए कंपनियां बंपर रकम जुटा रही हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस रकम को कंपनियां कहां खर्च कर रही हैं? इस बारे में बैंक बड़ौदा की इकोनॉमिक रिसर्च टीम ने एक बड़ा खुलासा किया है। यह रिपोर्ट अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच सेबी को भेजी गई 200 से ज्यादा कंपनियों की फाइलों को देखकर बनाई गई है। इनमें से 189 कंपनियों ने साफ-साफ बताया कि वे IPO से मिलने वाला पैसा किस काम में इस्तेमाल करेंगी।
MSN में छपी खबर के मुताबिक, बैंक ऑफ बडौ़दा ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में कहा है कि 189 कंपनियां मिलकर करीब 1.82 लाख करोड़ रुपये जुटाए थे। इसमें से 1.20 लाख करोड़ रुपये कंपनियों ने नए शेयर बेचकर जुटाए। 62,000 करोड़ रुपये पुराने शेयरधारक अपने शेयर बेचकर कमाएंगे। यानी ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए जुटाए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि OFS यानी Offer for Sale से जो पैसा आता है, वह कंपनी को नहीं मिलता है। यह पूरा पैसा प्रमोटर की जेब में जाता है। लिहाजा इस रकम को कंपनियां अपने प्रोजेक्ट या बिजनेस में नहीं इस्तेमाल कर सकती हैं।
आखिर कंपनियां कहां पैसे खर्च करती हैं?
BOB इकोनॉमिक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों की ओर से जुटाई गई 1.82 लाख करोड़ रुपये में से 66 फीसदी फ्रेश ऑफर के ज़रिए आई थी। वहीं बाकी रकम OFS के जरिए आई। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कंपनियां नए शेयर बेचकर जो 1.2 लाख करोड़ रुपये जुटा रही हैं, उसमें से करीब 29% यानी 34,441 करोड़ रुपये सिर्फ अपने पुराने कर्ज चुकाने में लगाएंगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि “यह डीलिवरेजिंग प्रोसेस का हिस्सा है, जहाँ कंपनियां फ़ंड जुटाने के लिए मार्केट जाती हैं, जिसका इस्तेमाल कर्ज़ चुकाने के लिए किया जाता है।”
बता दें कि बाजार से पैसा उठाकर कर्ज चुकाने की इस प्रक्रिया को ही “डीलिवरेजिंग” कहा जाता है। दरअसल, कंपनियां इसलिए ऐसा कर रही हैं ताकि उनके ऊपर कर्ज का बोझ कम हो जाए। इससे कंपनियों की स्थिति मजबूत होती है और उनकी बैलेंस शीट हल्की और स्थिर बनी रहती है।
कैपेक्स और अन्य उपयोग
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कंपनियां जुटाए गए पैसे का लगभग 26 फीसदी हिस्सा पूंजीगत व्यय (capital expenditure) के लिए रखा है। लगभग एक चौथाई हिस्सा कहां खर्च होगा, इस बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ है। डेटा से यह भी पता चला है कि 9.1 फीसदी फंड सब्सिडियरी में निवेश के लिए, 1.9 फीसदी लीज पेमेंट के लिए, 3.6 फीसदी ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए और 6.2 फीसदी वर्किंग कैपिटल के लिए रखा है।