
Middle East Crisis: अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों से ईरान अभी भी सदमे में है। कल जारी की गई लेटेस्ट सेटेलाइट तस्वीरों में भारी नुकसान देखा जा रहा है। अब इस युद्ध का असर सीधे आम आदमी की जेब और निवेश पर दिखने वाला है। दरअसल, मिडिल ईस्ट में बढ़ती सैन्य हलचल ने ग्लोबल इकोनॉमी में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। JM Financial की हालिया रिपोर्ट 'मिडल ईस्ट एस्केलेशन: राइजिंग ऑयल रिस्क फॉर इंडियन मार्केट्स' के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जो इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर किए गए हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में युद्ध को तेज कर दिया है, जिससे कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
इस संघर्ष में ईरान के सुप्रीम लीडर और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौत की खबरों के बाद जवाबी कार्रवाई की आशंकाएं तेज हो गई हैं। इस पूरे विवाद का केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। आपको बता दें कि दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी पतले समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। वहीं, भारत की कुल तेल जरूरतों का 40% से ज्यादा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है, जिसने चिंता बढ़ा दी है।
अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और यह समुद्री रास्ता बंद होता है या जहाजों का आवागमन प्रभावित होता है, तो भारत की एनर्जी सिक्योरिटी सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगी। अन्य उभरती इकोनॉमीज के मुकाबले भारत की स्थिति इसलिए नाजुक है क्योंकि यह अपनी जरूरतों का 85% तेल बाहर से खरीदता है। JM Financial की रिपोर्ट में कहा गया कि आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार की दिशा कंपनियों के मुनाफे से ज्यादा क्रूड ऑयल की कीमतों से तय होगी।
मौजूदा समय में ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। यह पिछले सात महीनों का उच्चतम स्तर है। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि यह संघर्ष सीमित रहता है, तो तेल की कीमतों में 5 से 10 डॉलर का इजाफा हो सकता है। लेकिन अगर ईरान के तेल बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचता है या हॉर्मुज का रास्ता बाधित होता है, तो कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
भारत के लिहाज से इन आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति डराने वाली है। कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी होने पर भारत का सालाना इंपोर्ट बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। यह अतिरिक्त बोझ हमारे व्यापार घाटे को बढ़ाता है और आखिरकार रुपए की वैल्यू को कम करता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो न केवल ईंधन बल्कि विदेश से आने वाली हर चीज महंगी हो जाती है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ता पर पड़ता है।
एक्सपर्ट्स ने इस संकट को एक बड़े ट्रांसमिशन चेन की चेतावनी दी है। दरअसल, जब क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो देश में महंगाई का खतरा बढ़ जाता है। महंगाई को कंट्रोल करने के लिए RBI कदम उठाता है, तो बॉन्ड यील्ड बढ़ती है और इसका सीधा निगेटिव असर शेयर बाजार के वैल्यूएशन पर पड़ता है। सेक्टोरल इम्पैक्ट की बात करें, तो पेंट,टायर, एविएशन और केमिकल कंपनियों पर सबसे अधिक होने वाला है। इन उद्योगों में कच्चे तेल के डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में होता है, जिससे उनकी लागत बढ़ेगी और मुनाफा घटेगा। हालांकि,ONGC और ऑयल इंडिया जैसी तेल उत्पादक कंपनियों को ऊंचे दामों का लाभ मिल सकता है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल जानकारी के लिए है। ऊपर दिए गए विचार और सिफारिशें, व्यक्तिगत विश्लेषकों या ब्रोकिंग कंपनियों के हैं, न कि मिंट के। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले प्रमाणित विशेषज्ञों से जांच करें।
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