MF Expense Ratio: म्यूचुअल फंड निवेशकों को बड़ी राहत, SEBI ने एक्सपेंस रेश्यो में की कटौती

SEBI Cuts MF Expense Ratio: सेबी ने आज म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो में कटौती का ऐलान किया है। आइए जानते हैं क्या-क्या बदलाव किए गए हैं। 

Shivam Shukla
अपडेटेड17 Dec 2025, 08:11 PM IST
SEBI ने म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो में की कटौती
SEBI ने म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो में की कटौती

SEBI Cuts Mutual Fund Expense Ratio: सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने आज एक बड़ा फैसला लिया है। बाजार नियामक ने लाखों म्यूचुअल फंड निवेशकों को बड़ी राहत देते हुए म्यूचुअल फंड एक्सपेंस रेश्यो में कटौती की। यह बदलाव एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) की मांगों को ध्यान में रखकर किया गया,जिससे कि ब्रोकरेज लागत पर प्रस्तावित कैप व्यावहारिक बने। अब एक्सेपेंस रेश्यो की लिमिट बेस एक्सपेंस रेश्यो के रूप में जान जाएंगी। इनमें GST, स्टांप ड्यूटी, सेबी चार्ज, एक्सचेंज फीस जैसे कई लायबिल्टी शामिल नहीं हैं।

SEBI ने क्या किया बदलाव

एक्सपेंस रेश्यो वज एनुअल फीस होती है, जो फंड मैनेजमेंट, प्रशासन और अन्य खर्चों के लिए काटा जाता है। पहले यह टोटल एक्सपेंस रेश्यो (TER) में सभी कानूनी और ब्रोकरेज चार्ज शामिल होते थे। अब मार्केट रेगुलेटरी SEBI ने साफ किया है कि कुल TER और BER के अलावा ब्रोकरेज, रेगुलेटरी और कानूनी देनदारियां अलग से जोड़ी जाएंगी, लेकिन BER की लिमिट कम कर दी गई है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।

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इन कैटेगरी फंडों में हुई कटौती

इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF): पहले 1.% (कानूनी शुल्क सहित), अब 0.90% (कानूनी शुल्क रहित) हो गया है।

फंड ऑफ फंड्स (FoF): पहले 1.00%, अब 0.90% हो गया है।

इक्विटी ओरिएंटेड स्कीम्स यानी AUM का 65% या अधिक इक्विटी में निवेश: पहले 2.25% और अब 2.10% हो गया है।

अन्य फंड ऑफ फंड्स: पहले 2.00% और अब 1.85% हो गया है।

क्लोज्ड-एंडेड स्कीम्स और अन्य नॉन-इक्विटी ओरिएंटेड फंडों में भी समान कटौती देखी गई है।

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निवेशकों को क्या होगा फायदा?

बता दें कि आम निवेशकों को सेबी इस फैसले से फायदा होगा। अगर आप इक्विटी फंड में इन्वेस्ट कर रहे हैं, तो कम चार्ज से आपके रिटर्न पर खर्च का बोझ कम होगा। 10-12 प्रतिशत के एवरेज रिटर्न वाले फंड में 0.15 प्रतिशत की कटौती भी लाखों रुपये के निवेश पर हजारों का फर्क डाल सकती है। इसके साथ ही कानूनी शुल्कों को अलग-अलग करने से फंड की लागत अधिक पार्दर्शी हो जाएगी। निवेशक अब आसानी से समझ सकेंगे कि उनका पैसा कहां जा रहा है। हालांकि, फंड हाउस पर दबाव बढ़ सकता है।

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