
Silver ETF: गुरुवार को चांदी के बाजार में जो हुआ, उसने कई निवेशकों को हैरान कर दिया। MCX पर सिल्वर भले ही करीब 4% फिसली हो, लेकिन सिल्वर ईटीएफ में गिरावट कहीं ज्यादा तेज रही। किसी ईटीएफ में 20% तो किसी में 24% तक की गिरावट देखने को मिली। सवाल यही है कि जब एमसीएक्स सिल्वर इतनी नहीं टूटी, तो ईटीएफ में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई?
22 जनवरी को MCX पर सिल्वर फ्यूचर्स करीब 4% टूटकर ₹3,05,753 प्रति किलो तक आ गए। यह गिरावट ऑल-टाइम हाई से करीब ₹30,000 नीचे की है। इसकी सबसे बड़ी वजह जियोपॉलिटिकल तनाव में नरमी मानी जा रही है। अमेरिका और ग्रीनलैंड को लेकर टकराव की आशंका कम होने से सेफ-हेवन डिमांड घटी और मजबूत डॉलर ने भी चांदी पर दबाव डाला।
जहां एमसीएक्स सिल्वर 4% फिसली, वहीं सिल्वर ईटीएफ में गिरावट कहीं ज्यादा तेज रही। टाटा सिल्वर ईटीएफ करीब 24% टूटकर ₹25.56 पर आ गया। Edelweiss सिल्वर ईटीएफ और Mirae Asset सिल्वर ईटीएफ में करीब 22% की गिरावट आई। 360 ONE सिल्वर ईटीएफ 21% और Nippon India सिल्वर ईटीएफ करीब 20% टूट गया। यही वजह है कि ईटीएफ में निवेश करने वाले सबसे ज्यादा परेशान नजर आए।
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह गिरावट सिर्फ ग्लोबल फैक्टर्स की वजह से नहीं है। INVasset PMS के बिजनेस हेड हर्षल दसानी का कहना है कि भारतीय बाजार में सिल्वर एक तरह के बजट से जुड़ी अटकलों के चलते अतिरिक्त प्रीमियम पर ट्रेड कर रही थी। आयात शुल्क बढ़ने की अफवाहों और पॉलिसी संकेतों की उम्मीद में MCX सिल्वर ने COMEX के मुकाबले काफी ज्यादा तेजी दिखाई थी।
एक वक्त पर भारतीय सिल्वर की कीमत करीब $107 प्रति औंस तक पहुंच गई थी, जबकि COMEX पर यह करीब $94 के आसपास थी। यानी लगभग $13 का असामान्य प्रीमियम। जब यह साफ हो गया कि फिलहाल कोई ड्यूटी राहत नहीं मिलने वाली, तो यह प्रीमियम तेजी से खत्म होने लगा और ETFs पर दबाव बढ़ गया।
सिल्वर ईटीएफ घरेलू स्पॉट प्राइस, निवेशकों के फ्लो और आर्बिट्राज प्रेशर तीनों पर रिएक्ट करते हैं। जब रिटेल निवेशक मुनाफावसूली के लिए एक साथ निकलते हैं, तो ईटीएफ यूनिट्स पर बिकवाली का दबाव ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि एमसीएक्स सिल्वर के मुकाबले ईटीएफ में गिरावट ज्यादा और तेज दिखी, भले ही ग्लोबल फंडामेंटल्स अचानक खराब न हुए हों।
VT Market के सीनियर मार्केट एनालिस्ट-APAC जस्टिन खू मानते हैं कि यह गिरावट पूरी तरह पैनिक जैसी नहीं है, बल्कि प्रॉफिट-बुकिंग और रिस्क री-बैलेंसिंग का नतीजा है। इक्विटी बाजारों में तेजी लौटने से भी सेफ-हेवन एसेट्स से पैसा निकला है। हालांकि, स्ट्रक्चरल डिमांड, सेंट्रल बैंक की खरीद और महंगाई से बचाव जैसे फैक्टर्स अभी भी मजबूत हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए यह लंबी अवधि में खरीदारी का मौका हो सकता है, लेकिन शॉर्ट-टर्म स्पेकुलेशन से बचना चाहिए।
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