
शेयर बाजार में पिछले दो साल से जिस स्मॉलकैप सेगमेंट ने निवेशकों को मालामाल किया था, साल 2025 में अचानक ब्रेक लग गया। बाजार की चाल ऐसी बदली कि जहां दिग्गज शेयरों वाले सेंसेक्स ने रफ्तार पकड़ी, वहीं छोटे शेयरों के पसीने छूट गए। 2025 के आंकड़ों पर नजर डालें, तो BSE स्मॉलकैप इंडेक्स में साल-दर-साल 6.6% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि इसी दौरान सेंसेक्स 9.1% की बढ़त के साथ झूम रहा था। यह पिछले छह सालों में स्मॉलकैप का सबसे निराशाजनक प्रदर्शन रहा है। हालांकि, बाजार के जानकारों का मानना है कि यह गिरावट डराने वाली नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो को साफ-सुथरा करने का एक मौका हो सकती है।
2025 में स्मॉलकैप की बिकवाली किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं थी। यह काफी व्यापक रही। लिहाजा, इंडेक्स के लगभग 73% शेयर लाल निशान में बंद हुए। डेटा के मुताबिक, 1,190 शेयरों में से 872 में गिरावट देखी गई, जिनमें से 321 शेयरों ने तो अपनी वैल्यू का 30% या उससे अधिक हिस्सा गंवा दिया। दबाव का यह सिलसिला जनवरी 2026 में भी थमता नहीं दिख रहा है। जनवरी में स्मॉलकैप इंडेक्स पहले ही 9.1% नीचे आ चुका है।
लेकिन हम लॉन्ग टर्म के प्रदर्शन पर नजर डालें, तो इसने अपने आप को हमेशा साबित किया है। अगर हम 2015 से 2025 के बीच के 10 सालों का ट्रैक रिकॉर्ड देखें, तो स्मॉलकैप ने 15.8% की सालाना दर (CAGR) से रिटर्न दिया है, जो सेंसेक्स के 12.6% के मुकाबले कहीं बेहतर है। यही वह उम्मीद है जो निवेशकों को फिर से अच्छे फंडामेंटल वाली कंपनियों की ओर खींच रही है।
बाजार के इस उतार-चढ़ाव के बीच कुछ कंपनियों ने अपने बेहतरीन बिजनेस मॉडल के दम पर निवेशकों का भरोसा जीता है। लुमैक्स ऑटो टेक्नोलॉजीज इस लिस्ट में सबसे ऊपर है, जिसकी बिक्री और मुनाफे में जबरदस्त उछाल देखा गया। इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सेक्टर से जुड़े भारी-भरकम ऑर्डर बुक के कारण कंपनी 2026 के लिए भी काफी उत्साहित है। वहीं, नवीन फ्लोरीन ने अपने मार्जिन में सुधार कर सबको चौंका दिया है।
कमोडिटी के मोर्चे पर MCX India और हिंदुस्तान कॉपर ने अपनी चमक बिखेरी है। तांबे की बढ़ती ग्लोबल डिमांड और ट्रेडिंग वॉल्यूम में उछाल ने इन शेयरों को पंख लगा दिए हैं। RBL Bank ने भी 2025 में अपने शेयर की कीमत दोगुनी की, हालांकि इसके मौजूदा वैल्यूएशन (Valuation) को लेकर विश्लेषक थोड़े सतर्क जरूर हैं।
दूसरी ओर, कुछ ऐसी कंपनियां भी रहीं जिन्होंने निवेशकों को निराश किया है। टेक्नो इलेक्ट्रिक एंड इंजीनियरिंग और केईसी इंटरनेशनल जैसे नामों ने राजस्व में तो बढ़त दिखाई, लेकिन मार्जिन के मोर्चे पर वे पिछड़ गए। ऊर्जा संचरण और डेटा सेंटर की मांग के बावजूद लागत बढ़ने से इनके मुनाफे पर चोट पड़ी है। हालांकि, तकनीकी रूप से साइन्ट (Cyient) जैसे शेयर अब ऐसे स्तर पर आ गए हैं, जहां नए निवेशकों के लिए जोखिम कम और संभावना ज्यादा नजर आ रही है।
फार्मा और रिटेल सेक्टर में नैटको फार्मा और बाटा इंडिया के लिए भी पिछला साल मिला-जुला रहा। बाटा को गोदामों में व्यवधान और विज्ञापन पर अधिक खर्च के कारण मार्जिन का नुकसान उठाना पड़ा, जबकि नैटको फार्मा के लिए भविष्य की उम्मीदें अब अमेरिका में होने वाले नए ड्रग लॉन्च पर टिकी हैं। इन कंपनियों के प्रदर्शन से साफ है कि केवल ब्रांड नाम ही काफी नहीं, बल्कि परिचालन दक्षता भी उतनी ही जरूरी है।
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