Federal Reserve Decision: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने बुधवार को बेंचमार्क ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया। फिलहाल बेंचमार्क ब्याज दरें 3.5% से 3.75% के दायरे में स्थिर रहेंगी। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने ग्लोबल इकोनॉमी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। एक तरफ महंगाई का डर है, तो दूसरी तरफ इकोनॉमी ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत मिल रहे हैं। फेडरल रिजर्व ने ‘वेट एंड वॉच’ की पॉलिसी अपनाई है।
फेड ने क्यों नहीं किया कोई बदलाव?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने क्रू़ड ऑयल मार्केट में भारी उथल-पुथल मचा दी है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी हुई हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह तनाव और बढ़ता है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ऐसे में जब तेल महंगा होगा, तो उसका सीधा असर माल ढुलाई और उत्पादन लागत पर पड़ेगा। इससे महंगाई बढ़ सकती है। इसी को देखते हुए फेड रिजर्व ने ब्याज दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया है।
महंगाई के अनुमानों में बदलाव
फेडरल रिजर्व ने समरी ऑफ इकोनॉमिक प्रोजेक्शंस में यह साफ कर दिया है कि वह महंगाई को लेकर अब पहले से ज्यादा सतर्क है। बैंक ने साल 2026 के आखिर तक अपनी पसंदीदा मुद्रास्फीति (PCE) के अनुमान को 2.4% से बढ़ाकर 2.7% कर दिया है। इसी तरह कोर इन्फ्लेशन के अनुमान को भी 2.5% से बढ़ाकर 2.7% कर दिया गया है। इसमें खाने-पीने और ईंधन जैसी उतार-चढ़ाव वाली चीजों को शामिल नहीं किया जाता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
दरअसल, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से ब्याज दरों में बदलाव का पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं और शेयर बाजारों पर असर पड़ता है। अगर अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो भारत जैसे उभरते बाजारों से विदेशी निवेश वापस जा सकता है। जिससे रुपया कमजोर होता है। डॉलर के मुकाबले रुपया की कमजोरी की वजह से इंपोर्ट महंगा होता है, जिसका सीधा असर आम आदमी पर देखने को मिलता है।
इस साल एक भी बार नहीं हुआ कोई बदलाव
बता दें कि पिछले साल यानी 2025 में फेडरल रिजर्व ने लगातार तीन बार ब्याज दरों में कटौती की थी। लेकिन इस साल की शुरुआत से ही ब्रेक लग हुआ है। फेडरल रिजर्व एक तरफ महंगाई को 2% के टार्गेट के करीब लाना चाह रहा है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी ध्यान दे रहा है कि देश में रोजगार के मौके कम ना हों। वहीं, ईरान तनाव की वजह से सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें और बढ़ती इनपुट कॉस्ट ने इस बैलेंस को बनाए रखने के लिए चुनौती खड़ी कर दी है।