IPO में केवल GMP न देखें, समझें Fresh Issue और OFS का अंतर, वरना डूब सकता है आपका पैसा!

Fresh Issue vs OFS: IPO में निवेश से पहले फ्रेश इश्यू और ऑफर फॉर सेल (OFS) का अंतर समझना जरूरी है। जानिए कैसे फ्रेश इश्यू का पैसा कंपनी की ग्रोथ में जाता है, जबकि OFS की रकम प्रमोटर्स की जेब में पहुंचती है।

Shivam Shukla
अपडेटेड18 Jul 2026, 12:40 PM IST
 Fresh Issue और OFS का अंतर समझें, वरना डूब सकता है आपका पैसा
Fresh Issue और OFS का अंतर समझें, वरना डूब सकता है आपका पैसा

नई दिल्ली: प्राइमरी शेयर मार्केट में जब भी कोई नया इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) लॉन्च होता है, तो निवेशकों के बीच ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) और सब्सक्रिप्शन स्टेटस को लेकर होड़ मच जाती है। हर कोई यह जानना चाहता है कि लिस्टिंग के दिन कितना मुनाफा होगा। लेकिन, समझदार निवेशक कभी भी इन आंकड़ों को देखकर अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटजी नहीं बनाते हैं। दरअसल, कोई भी आईपीओ फ्रेश इश्यू और ऑफर फॉर सेल (OFS) के रेश्यो में बंटा होता है । इसी अनुपात से तय होता है कि आपके निवेश किए गए पैसे का इस्तेमाल कंपनी को बड़ा बनाने में होगा या फिर किसी की जेब में जाएगा।

क्या होता है फ्रेश इश्यू और कहां जाता है इसका पैसा?

दरअसल,जब कोई कंपनी बाजार में फ्रेश इश्यू लेकर आती है, तो इसका सीधा मतलब होता है कि वह नए शेयर जारी कर रही है। इस प्रक्रिया से जो भी पैसा जुटता है, वह सीधे कंपनी के बैंक अकाउंट में जाता है। कंपनियां इस कैपिटल का इस्तेमाल अपने बिजनेस का विस्तार करने, पुराना कर्ज चुकाने, नई कंपनियों का अधिग्रहण करने या अपनी वर्किंग कैपिटल को मजबूत करने के लिए करती हैं।

जब प्रमोटर्स और पुराने निवेशक बेचते हैं अपनी हिस्सेदारी

दूसरी ओर, ऑफर फॉर सेल यानी OFS पूरी तरह अलग होता है। इसमें कंपनी कोई नया शेयर जारी नहीं करती, बल्कि पुराने शेयरधारक-जैसे कि कंपनी के प्रमोटर्स, शुरुआती निवेशक, वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी फंड अपने हिस्से के शेयर आम निवेशकों को बेचते हैं। इस सौदे से मिलने वाली रकम का एक भी रुपया कंपनी के पास नहीं जाता है। सारा पैसा सीधे उन बेचने वाले शेयरधारकों की जेब में पहुंच जाता है।

हाई OFS वाले IPO में निवेश की सही रणनीति

अगर किसी आईपीओ में OFS का हिस्सा 80 प्रतिशत या उससे अधिक है, तो साफ है कि कंपनी अपने कारोबार के लिए कोई नया फंड नहीं जुटा रही है। यह केवल पुराने निवेशकों के लिए पैसा बनाने का एक जरिया है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कंपनी खराब है या उसका भविष्य धुंधला है। अगर बिजनेस मॉडल मजबूत है और वैल्यूएशन सही है, तो निवेश किया जा सकता है।

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