What is OFS: शेयर बाजार का सबसे तेज तरीका, ऑफर फॉर सेल आखिर क्या है? आइए समझते हैं पूरा गणित

What is OFS: आम निवेशक के मन में अक्सर एक सवाल रहता है कि  ऑफर फॉर सेल (OFS) होता क्या है? क्यों ये आईपीओ से अलग है। आइए विस्तार से जानते हैं। 

Shivam Shukla
पब्लिश्ड11 Dec 2025, 08:57 PM IST
ऑफर फॉर सेल क्या होता है
ऑफर फॉर सेल क्या होता है

What is Offer For Sale: शेयर बाजार में आए दिन सुनने को मिलता है कि किसी कंपनी ने OFS लॉन्च किया, सरकार OFS से हजारों करोड़ जुटाने जा रही है या फिर किसी OFS के पहले दिन 5 गुना सब्सक्रिप्शन हो गया। लेकिन आम निवेशक के मन में सवाल रहता है कि ये ऑफर फॉर सेल (OFS) होता क्या है? क्यों ये आईपीओ से अलग है। क्यों हर बड़े शेयर बिक्री के लिए यही तरीका अपनाया जाता है? आज हम इसी के बारे में विस्तार से जानेंगे।

ऑफर फॉर सेल (OFS) क्या है?

ऑफर फॉर सेल (OFS) वो तरीका है जिसमें कोई प्रमोटर, सरकार या बड़ा शेयरधारक अपनी मौजूदा हिस्सेदारी बाजार में बेचते हैं। कंपनी को नया पैसा नहीं मिलता, केवल बेचने वाले के खाते में रकम आती है। बस इतना सा फर्क है, लेकिन असर बहुत बड़ा होता है।

IPO से कैसे अलग है OFS?

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में कंपनी नए शेयर जारी करती है। लंबी प्रक्रिया चलती है और महीनों लग जाते हैं। लेकिन OFS सिर्फ दो दिन का खेल है। 2012 में मार्केट रेगुलेटरी SEBI ने इसे शुरू किया था, ताकि सरकार सार्वजनिक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी तेजी से कम कर सके। आज प्राइवेट कंपनियों के प्रमोटर भी इसी का इस्तेमाल करते हैं। अल्ट्राटेक-इंडिया सीमेंट्स हो या एचडीएफसी बैंक का पुराना OFS, सब इसी रास्ते से हुए। फायदा यह कि न ज्यादा कागजी काम, न समय लगता है और बाजार में पारदर्शिता बनी रहती है।

दो दिन में कैसे पूरा होता है पूरा खेल?

पहला दिन केवल बड़े निवेशकों के लिए होता है, जिसमें म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस कंपनियां, विदेशी निवेशक हिस्सा लेते हैं। वे बोली लगाते हैं। जो कीमत सबसे ज्यादा बोली जाती है, उसी के आसपास क्लियरिंग प्राइस तय होती है। दूसरा दिन खुदरा निवेशकों के लिए खुलता है। अगर पहले दिन ही पूरे शेयर बिक जाए तो दूसरे दिन कुछ बचता नहीं। कई बार 10-15 प्रतिशत डिस्काउंट पर शेयर मिल जाते हैं। इसलिए पहले दिन की बोली देखकर बाजार में उछाल आ जाता है। सेटलमेंट अगले ही दिन हो जाता है।

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निवेशकों को OFS से क्या फायदा और क्या नुकसान?

सबसे बड़ा फायदा यह है कि अच्छी कंपनी के शेयर बाजार भाव से सस्ते में मिल सकते हैं। फ्लोर प्राइस अक्सर पिछले बंद भाव से कम रखी जाती है। नुकसान यह कि रिटेल निवेशकों के लिए अब न्यूनतम 2 लाख रुपये की बोली लगानी पड़ती है। पहले 1 लाख थी। साल 2023 में यह नियम बदल गया है। अगर ओवर-सब्सक्रिप्शन ज्यादा हुआ तो पूरा पैसा भी नहीं लग पाता, प्रो-राटा अलॉटमेंट होता है। फिर भी ज्यादातर OFS में शेयर मिलने के बाद कीमत ऊपर जाती देखी गई है।

सरकार ने इन कंपनियों से कम की हिस्सेदारी

पिछले कुछ साल में सरकार ने ONGC, NTPC, Coal India, SAIL जैसी दर्जनों कंपनियों में OFS से लाखों करोड़ रुपये जुटाए। प्राइवेट सेक्टर में भी Paytm, Adani Enterprises, Yes Bank जैसी कंपनियों ने इस रास्ते का इस्तेमाल किया। बाजार के जानकार मानते हैं कि आने वाले समय में भी OFS ही विनिवेश और हिस्सेदारी बिक्री का सबसे पसंदीदा तरीका बना रहेगा।

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