Warren Buffett 90/10 Investment Rule: क्या है 90/10 रूल? निवेश का ऐसा फॉर्मूला जिस पर बफे ने अपनी वसीयत तक टिका दी

90/10 Investment Rule: क्या वॉरेन बफे का 90/10 इन्वेस्टमेंट रूल आम निवेशकों के लिए सही रास्ता है? इसमें 90% पैसा इक्विटी और 10% सुरक्षित निवेश में रखने की बात कही जाती है। लेकिन भारत जैसे बाजार में इसे कैसे अपनाया जाए, इसके फायदे–नुकसान क्या हैं और किन निवेशकों के लिए यह काम कर सकता है?

Priya Shandilya
अपडेटेड22 Jan 2026, 05:14 PM IST
90/10 इन्वेस्टमेंट रूल क्या है? वॉरेन बफे क्यों इस स्ट्रैटेजी पर भरोसा करते हैं (फाइल फोटो)
90/10 इन्वेस्टमेंट रूल क्या है? वॉरेन बफे क्यों इस स्ट्रैटेजी पर भरोसा करते हैं (फाइल फोटो)(AP)

Warren Buffet 90/10 Investment Rule: निवेश की दुनिया में वॉरेन बफे का नाम भरोसे और लंबे अनुभव का प्रतीक माना जाता है। "Oracle of Omaha" कहे जाने वाले बफे ने हमेशा साधारण निवेशकों को आसान और टिकाऊ रास्ते सुझाए हैं। उन्हीं में से एक है उनका मशहूर 90/10 इन्वेस्टमेंट रूल।

क्या है ये 90/10 नियम?

बफे का 90/10 रूल बहुत सीधा है। इसके मुताबिक, अपने निवेश का 90% हिस्सा एक लो-कॉस्ट S&P 500 जैसे ब्रॉड मार्केट इंडेक्स फंड में लगाइए और बाकी 10% शॉर्ट-टर्म सरकारी बॉन्ड्स में। बफे का मानना है कि ज्यादातर लोग स्टॉक्स चुनने में माहिर नहीं होते, इसलिए बेहतर है कि पूरे मार्केट पर भरोसा किया जाए और कम खर्च वाले इंडेक्स फंड्स में निवेश किया जाए।

बफे क्यों करते हैं इस स्ट्रैटेजी पर इतना भरोसा?

बफे का कहना साफ है कि मैनेजमेंट फीस बचाइए, पूरे मार्केट पर दांव लगाइए और धैर्य रखिए। उनका मानना है कि लंबी अवधि में इक्विटी, बॉन्ड या कैश से बेहतर रिटर्न देती है। यही वजह है कि उन्होंने अपनी वसीयत में भी यही लिखा है कि उनकी पत्नी के लिए छोड़ी गई रकम इसी 90/10 रूल के हिसाब से निवेश की जाए।

भारतीय निवेशकों के लिए कितना कारगर है ये नियम?

यह सलाह अमेरिकी निवेशकों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर दी गई थी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये फॉर्मूला भारत में भी काम कर सकता है? एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सोच वही रह सकती है, लेकिन ढांचा थोड़ा बदलना होगा।

एंजेल वन के सीनियर फंडामेंटल एनालिस्ट वकारजावेद खान के मुताबिक, भारत में 75% Nifty 500, 15% एक्टिव फंड्स और 10% सरकारी बॉन्ड्स, लिक्विड फंड या कैश में रखा जा सकता है। इससे ग्रोथ और सेफ्टी दोनों का संतुलन बनता है।

संवित्ति कैपिटल क डायरेक्टर और प्रिंसिपल ऑफिसर (पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज) प्रभाकर कुदवा के अनुसार, Nifty 50, Nifty 500 या BSE 500 जैसे इंडेक्स फंड्स भारतीय निवेशकों के लिए अच्छे विकल्प हैं। बॉन्ड्स की जगह शॉर्ट-टर्म डेट फंड्स या लिक्विड फंड्स बेहतर रहेंगे।

इस स्ट्रैटेजी के फायदे:

  • स्टॉक चुनने की स्किल की जरूरत नहीं।
  • खर्च कम रहता है- कम फीस की वजह से लंबे समय में मुनाफा ज्यादा बचता है।
  • जोखिम थोड़ा बंट जाता है- शेयरों के साथ सुरक्षित निवेश होने से संतुलन बना रहता है।
  • इमोशनल फैसलों से बचाव- बाजार गिरने-बढ़ने पर घबराकर बेचने की नौबत नहीं आती।
  • कंपाउंडिंग का फायदा- शेयर बाजार की कंपाउंडिंग का असर समय के साथ बेहतर दिखता है।

इस स्ट्रैटेजी के नुकसान:

  • भारत में चुनिंदा शेयरों पर ज्यादा निर्भरता- हमारे यहां इंडेक्स सीमित कंपनियों पर टिके होते हैं, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।
  • अतिरिक्त मुनाफा कमाने का मौका छूट सकता है – यह तरीका पूरे बाजार के साथ चलता है, इसलिए बाजार से बेहतर रिटर्न की संभावना नहीं रहती।
  • 90% पैसा शेयरों में लगाना कई लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा- जिनका निवेश का समय कम है या जो रिटायरमेंट के करीब हैं, उनके लिए यह तरीका सुरक्षित नहीं माना जाता।
  • कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव झेलना पड़ता है- बाजार गिरने-बढ़ने पर पोर्टफोलियो की वैल्यू तेजी से बदलती है, जिसे हर निवेशक संभाल नहीं पाता।
  • बाजार गिरने पर नुकसान ज्यादा दिख सकता है- किसी बड़ी गिरावट में थोड़े समय में अच्छा-खासा नुकसान नजर आ सकता है।

वॉरेन बफे का 90/10 रूल निवेश को आसान और टिकाऊ बनाने का तरीका है। भारत में इसे अपनाने के लिए थोड़े बदलाव जरूरी हैं, लेकिन इसका मूल विचार- लंबी अवधि में कम खर्च और ज्यादा भरोसेमंद रिटर्न, हर निवेशक के लिए सीखने लायक है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। ऊपर दिए गए विचार और सिफारिशें व्यक्तिगत विश्लेषकों या ब्रोकिंग कंपनियों के हैं, न कि मिंट के। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले प्रमाणित विशेषज्ञों से जांच करें।

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