
How to Report Insurance Miss Selling: गलत वादों से लोगों को बहला-फुसलाकर जीवन बीमा बेचने की शिकायतें घटने का नाम नहीं ले रही हैं। बल्कि भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट तो कहती है कि एक वर्ष में ही शिकायतों में 14.3% की वृद्धि हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2024 से दिसंबर 2025 के बीच देशभर से कुल 26,667 शिकायतें जीवन बीमा के नाम पर फर्जीवाड़े को लेकर आईं।
देश में, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में लोग सुरक्षित निवेश के लिए अब भी 'बैंक एफडी' पर भरोसा करते हैं। जीवन बीमा बेचने वाला एजेंट लोगों के इसी भरोसे को उन्हें धोखा देने और अपना उल्लू सीधा करने में इस्तेमाल करता है। एजेंट लोगों को बताता है कि कैसे इंश्योरेंस तो फिक्स्ड डिपॉजिट से भी बेहतर है जो एफडी जितना या उससे भी ज्यादा रिटर्न देता ही है, मुफ्त में इंश्योरेंस भी मिल जाता है।
दरअसल, एजेंट जिन इंश्योरेंस स्कीम की तुलना एफडी से करता है, वो एंडोमेंट प्लान या यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIPs) होते हैं। एजेंट ऊंचे रिटर्न की गारंटी देकर लोगों को यही प्लांस खरीदने को अक्सर राजी कर लेता है। हालांकि, एफडी और एंडोमेंट प्लान या यूलिप्स में कोई तालमेल नहीं होता है।
एफडी अक्सर पांच से सात वर्ष की अवधि के लिए होता है तो ये प्लांस इनसे दोगुने समय के। ऊपर से इन जीवन बीमा योजनाओं में लॉक इन पीरियड, कई तरह के शुल्क और प्लान सरेंडर करने पर जुर्माना लगाने जैसे प्रावधान होते हैं। इन सबके कारण इन प्लांस पर रिटर्न, एफडी के मुकाबले काफी कम हो सकता है।
वो तीन गलत काम जो एजेंट आपको जीवन बीमा बेचते समय करते हैं, उनमें शामिल हैं- अधूरी जानकारी देना, वादे से इतर गलत प्रॉडक्ट बेचना और प्रीमियम के जल्द महंगा होने का डर दिखाना। आइए एक-एक कर समझते हैं कि एजेंट अपने फायदे के लिए किस तरह आपको किसी भी हद तक नुकसान पहुंचाने पर आमादा रहता है। इसलिए कैसे एजेंट की बातों के जाल में नहीं फंसें, इसके तरीकों पर भी बात करेंगे।
हेल्थ इंश्योरेंस एजेंट अक्सर पॉलिसी के मुख्य विवरणों को छिपाते हुए आपके सामने केवल लाभ और रिटर्न की बातें ही दोहराते रहते हैं। उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसकर आपको यह अच्छे से पता नहीं होता है कि प्रीमियम कब-कब भरना होगा। आपको लगता है कि सीमित प्रीमियम ही देना है, लेकिन एजेंट आपसे रेग्युलर प्रीमियम पेमेंट वाला प्लान दे चुका होता है। ठीक इसके उलट भी हो सकता है।
ध्यान रहे कि यदि प्रीमियम पेमेंट जल्दी बंद हो जाए तो मैच्योरिटी बेनिफिट में काफी अंतर आ जाता है। इतना ही नहीं, एजेंट आपसे यह छिपाने की भी पुरजोर कोशिशें करता है कि आपके प्लान में क्या-क्या शामिल नहीं है। अगर आप जोर देकर नहीं पूछें तो एजेंट की यह बताने में भी रुचि नहीं होती है कि पॉलिसी बीच में ही सरेंडर करना पड़े तो क्या होगा? क्या कोई पेनल्टी लगेगी और लगेगी तो कितनी? वहीं, पॉलिसी पर मिलने वाले बोनस को लेकर वो बड़े-बड़े दावे करता है।
एजेंट अक्सर वो प्लान आपको बताता है जिनमें उसका ज्यादा फायदा हो। ऐसे में आपकी जरूरतों की अनदेखी हो जाती है। आपको झटका तब लगता है जब उस प्लान का फायदा उठाने की बारी आती है। जैसे अधिकांश कामकाजी व्यक्तियों को शुद्ध टर्म कवर की आवश्यकता होती है, लेकिन उन पर कम कमीशन बनने के कारण एजेंट अक्सर मनी बैक पॉलिसी या यूलिप्स खरीदने की सलाह देता है।
अपना हित साधने में जुटा एजेंट आपकी आय और देनदारियों का मूल्यांकन नहीं करता है और मोटे रिटर्न के वादों से आपके दिमाग से यह बात भी निकाल देता है कि आपने तो भविष्य की सुरक्षा के लिए जीवन बीमा लेने का सोचा था ना कि मोटा रिटर्न कमाने के लिए। आखिर में आपको ना अच्छा रिटर्न मिलता है ना अच्छा लाइफ कवर। आप महंगी लंबी अवधि की बचत योजनाओं में फंस जाते हैं जिससे गाढ़े वक्त में वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की आपकी चाहत धरी की धरी रह जाती है।
कई बार एजेंट यह कहता है कि जल्दी कीजिए वरना फलां तारीख से प्रीमियम बढ़ जाएगा और आपके लिए इंश्योरेंस लेना महंगा हो जाएगा। आप सोचेंगे कि पॉलिसी खरीदनी ही है तो देर करके ज्यादा पैसा क्यों खर्च करना। बस यहीं खेल हो जाता है। आप एजेंट के दावों को वेरिफाई नहीं कर पाते हैं क्योंकि आपके पास अब इसके लिए वक्त ही नहीं बचा है। ऐसे में होता यही है कि आप जो चाहते थे, वो आपको नहीं मिलता है बल्कि एजेंट जो देना चाहता था, वो देकर चला गया जाता है।
कुछ बातों का ध्यान रखेंगे तो यह कहावत सिद्ध हो जाएगी- एजेंट डाल-डाल तो आप पात-पात। इसमें सबसे पहला उपाय है कि एजेंट प्रीमियम बढ़ने का लाख डर दिखाए, लेकिन आप जल्दबाजी नहीं करें। फर्जीवाड़े में फंसने से बचने के लिए इन बातों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करें...
1. आपकी जरूरत क्या है, यह तय करने में एजेंट की मदद नहीं लें बिल्कुल स्वतंत्र रूप से फैसला करें। जरूरी हो तो परिवार में राय-मशविरा करें।
2. कई बार एजेंट जान-पहचान का या रिश्तेदार होता है। ऐसी स्थिति में बार-बार सवाल पूछने से संकोच नहीं करें। जब एजेंट आपको भरोसे में लेने की कोशिश करे और कहे कि सबकुछ उस पर छोड़ दें, वो बेस्ट प्लान दे रहा है तो आप दबाव में बिल्कुल न आएं।
3. एजेंट के मौखिक वादों पर भरोसा नहीं करें, सब कुछ लिखित में लें।
4. इंश्योरेंस प्लान से जुड़े कागजातों में चार बातों को गौर से समझें। पहला- बीमा प्लान के लाभ क्या-क्या हैं, दूसरा- प्रीमियम कब-कब और कितना जाएगा और तीसरा- कौन-कौन से चार्ज लग रहे हैं, और चौथा- बीच में पॉलिसी सरेंडर करने को लेकर क्या प्रावधान हैं।
5. यह भी पता करें कि जो प्लान आप ले रहे हैं, उनको लेकर टैक्स के क्या प्रावधान हैं।
6. जब तक पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएं, पेपर्स पर साइन नहीं करें।
7. अगर एजेंट आपकी मर्जी के बिना रजिस्ट्रेशन कर दे तो आप उसे ओटीपी नहीं बताएं।
8. जब आपके पास वेरिफिकेशन कॉल आए तब बहुत चौकन्ना रहें। एक-एक बात को गौर से सुनें और जैसे ही लगे कि एजेंट ने यह बात नहीं बताई थी या जो बताई थी वो नहीं दिया गया है तो तुरंत पॉलिसी लेने से इनकार कर दें।
1. लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में 15 से 30 दिनों का फ्री-लुक पीरियड मिलता है। इस अवधि के भीतर बहुत कम नुकसान पर पॉलिसी कैंसल करवा सकते हैं।
2. यदि फ्री-लुक अवधि समाप्त हो गई है, तो तुरंत एक्शन लें। पॉलिसी डॉक्युमेंट, बिक्री सामग्री, ईमेल और एजेंट से हुई बातचीत जैसे सारे सबूत और दस्तावेज इकट्ठा करें और बीमाकर्ता के शिकायत अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराएं।
3. यदि 30 दिनों के भीतर समाधान नहीं होता है, तो IRDAI के बीमा भरोसा पोर्टल के माध्यम से बीमा लोकपाल के पास शिकायत दर्ज करें।
4. आप आरबीआई के सचेत प्लैटफॉर्म पर भी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।
6. यदि आवश्यक हो, तो कन्ज्यूमर हेल्पलाइन की मदद लें और जरूरत पड़े तो उपभोक्ता अदालत से संपर्क करें।
7. अगर आपने दो-तीन वर्ष तक प्रीमियम भर दिया, उसके बाद आपको पॉलिसी में गड़बड़ी समझ आई तो उसे पेड-अप बनाने पर विचार करें या यह आकलन करें कि प्रीमियम पेमेंट जारी रखने में ज्यादा नुकसान है या पॉलिसी से बाहर निकलने में। पॉलिसी पेड-अप बनाने से आपको आगे कोई भी प्रीमियम भरने की जरूरत नहीं पड़ती है लेकिन पॉलिसी लैप्स नहीं होती। आपको इंश्योर्ड अमाउंट मिल जाता है।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। जीवन बीमा बेचने वाले एजेंट गलत ही करते हैं, मिंट हिंदी की ऐसी कोई राय नहीं है। यह लेख IRDAI की रिपोर्ट के आधार पर पाठकों को सतर्क करने भर का प्रयास है।
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