
Abakkus Small Cap Fund: मार्केट के दिग्गज खिलाड़ी सुनील सिंघानिया के नेतृत्व वाली अबक्कस म्यूचुअल फंड ने अपना दूसरा इक्विटी फंड ‘स्मॉल कैप फंड’ बाजार में उतार दिया है। यह न्यू फंड ऑफर (NFO) 25 फरवरी से निवेश के लिए खुल चुका है और निवेशक 12 मार्च तक इसमें अपना पैसा लगा सकते हैं। स्मॉल कैप सेगमेंट में बढ़ती दिलचस्पी के बीच, इस नए फंड की खासियत और बाजार के मौजूदा उतार-चढ़ाव को समझने के लिए मिंट हिंदी के शिवम शुक्ला ने अबक्कस म्यूचुअल फंड्स के रिसर्च और इन्वेस्टमेंट हेड संजय दोशी से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में जानें कि क्या यह नया फंड आपके पोर्टफोलियो के लिए सही है।
इसे समझने के दो मुख्य पहलू हैं। पहला तो यह कि हमने इंडेक्स लेवल पर स्पष्ट रूप से देखा है कि निफ्टी के तुलनात्मक मुकाबले एक अंडरपरफॉर्मेंस रही है। लेकिन असली तस्वीर इंडेक्स से बाहर निकलने पर दिखती है। अगर आप सिर्फ टॉप कंपनियों को नहीं, बल्कि पूरे स्मॉलकैप के दायरे को देखें—जिसमें हम 2000 करोड़ के मार्केट कैप से लेकर करीबन 34,700 करोड़ के मार्केट कैप तक की बात करते हैं—तो स्थिति बहुत रोचक है।
हकीकत यह है कि इस पूरे सेगमेंट के लगभग 50% स्टॉक्स अपने ऑल-टाइम हाई से 40% से भी ज्यादा नीचे गिर चुके हैं। इसका मतलब है कि एक बड़ा प्राइस करेक्शन पहले ही आ चुका है। दूसरा, जैसा कि आपने आंकड़ों में कहा कि पीई (PE) 25-26 के आसपास है, जो ऐतिहासिक औसत के लिहाज से थोड़ा नीचे या उसके करीब है। लेकिन सिर्फ पीई देखना पर्याप्त नहीं होता, हम हमेशा वैल्यूएशन को ग्रोथ (Growth) के साथ जोड़कर देखते हैं।
जब हम स्मॉलकैप सेगमेंट को प्राइस/अर्निंग्स ग्रोथ रेश्यो (PEG Ratio) पर देखते हैं, तो यह अनुपात 'एक' (1) के करीब आ चुका है। इसके विपरीत, लार्जकैप अभी भी 1.25 के आसपास है और मिडकैप 1.3 से 1.4 के बीच ट्रेड कर रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि स्मॉलकैप में ग्रोथ की उम्मीदों के मुकाबले वैल्यूएशन अब बहुत वाजिब हो गए हैं। कई स्टॉक्स तो ऐसे हैं जो अपने शिखर से 50% गिरने के बाद 0.7 या 0.8 के पीईजी (PEG) पर मिल रहे हैं। इसलिए, यदि आपका नजरिया अगले 3 से 5 साल का है, तो एक प्रोफेशनल और अनुशासित तरीके से स्मॉलकैप में प्रवेश करने का यह सबसे सही समय हो सकता है।
स्मॉलकैप में वोलैटिलिटी उसकी प्रकृति में है और निवेशक अक्सर इसी से घबराते हैं। हम हमेशा कहते हैं कि स्मॉलकैप में निवेश के लिए 'लंबी अवधि' की सोच अनिवार्य है। कम से कम 3-5 साल का व्यू लेकर ही इस सेगमेंट में कदम रखें।
जहां तक पैसिव फंड्स के मुकाबले हमारे एक्टिव मैनेजमेंट और MEETS फ्रेमवर्क की बात है, तो हमारी ताकत हमारी 'डीप रिसर्च' में है। पैसिव फंड केवल उन्हीं कंपनियों को खरीदते हैं जो इंडेक्स का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन हमारी फिलॉसफी 'अनडिस्कवर्ड' और 'अंडर-रिसर्च्ड' कंपनियों को ढूंढने की है।
हमारा MEETS फ्रेमवर्क पांच मुख्य स्तंभों पर आधारित है:
Management Quality: मैनेजमेंट का ट्रैक रिकॉर्ड और ईमानदारी।
Earnings: कमाई की निरंतरता और टिकाऊपन।
Events: बाजार के नकारात्मक इवेंट्स और ट्रेंड्स की मैपिंग।
Timings: निवेश के लिए सही समय का चुनाव।
Structural Opportunity: बिजनेस मॉडल की लंबी अवधि की मजबूती।
हमारी टीम उन कंपनियों को चुनती है जिन्हें बाजार ने अभी पूरी तरह नहीं समझा है। इंडेक्स को फॉलो करने के बजाय 'वैल्यू' खोजने की यह रणनीति पैसिव फंड्स के मुकाबले बेहतर रिटर्न की संभावना बढ़ाती है।
सनराइज सेक्टर्स में हमारा भरोसा बहुत मजबूत है। पहला सेगमेंट है इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग (EMS) और सेमीकंडक्टर। इसमें सरकार का बहुत बड़ा समर्थन है। हम भारत को सिर्फ एक खपत का केंद्र नहीं, बल्कि ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग बेस बनते देख रहे हैं। इंजीनियरिंग स्किल्स और बेहतर कॉस्ट डायनामिक्स की वजह से हम न केवल घरेलू मांग पूरी करेंगे, बल्कि वैश्विक बाजार को भी सप्लाई करेंगे।
दूसरा बड़ा भरोसा हेल्थकेयर (CDMO/CRMO) पर है। दुनिया भर की दवा कंपनियां अब चीन के अलावा एक भरोसेमंद विकल्प ढूंढ रही हैं। भारत की कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी धाक जमा रही हैं। बायोसिमिलर्स में होने वाला रिसर्च भारतीय कंपनियों के लिए बहुत बड़ी ओपोरर्चुनिटी खोल रहा है।
तीसरा, हम एक्सपोर्ट बेनेफिशियरी को लेकर बहुत उत्साहित हैं। यूके, यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ जो ट्रेड डील्स हो रही हैं, उनका फायदा इंजीनियरिंग, ऑटो कंपोनेंट्स और टेक्सटाइल जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को मिलेगा। ये वे सेक्टर्स हैं जहां ग्रोथ की विजिबिलिटी अब बहुत साफ नजर आ रही है।
सेबी के नियम निवेशकों की सुरक्षा के लिए हैं और हम उनका पूरी तरह समर्थन करते हैं। स्मॉलकैप में लिक्विडिटी रिस्क को मैनेज करने के लिए हमने कुछ बहुत ही सख्त आंतरिक नियम बनाए हैं।
पोजीशन लिमिट: हम किसी भी स्टॉक में खरीदारी के समय 3% से ज्यादा हिस्सा नहीं लेंगे।
पैसिव लिमिट (ट्रिमिंग): यदि कोई स्टॉक बहुत अच्छा चलता है और पोर्टफोलियो में उसका वजन बढ़ जाता है, तो 5% के स्तर पर हम उसे ट्रिम कर देंगे। इससे कंसंट्रेशन रिस्क कम रहता है।
मार्केट कैप डायवर्सिफिकेशन: स्मॉलकैप के अंदर भी 35,000 करोड़ से लेकर 2000 करोड़ तक की रेंज होती है। हमने बहुत छोटी कंपनियों (जिनमें लिक्विडिटी कम हो सकती है) के लिए एक कैप लगाया है। पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा (50-60%) हमेशा लिक्विड काउंटर्स में रहेगा।
कैश बफर: हम इस फंड में अन्य फंड्स के मुकाबले थोड़ा ज्यादा कैश बफर (करीब 5-6%) रखने की योजना बना रहे हैं ताकि रिडेम्पशन के समय कोई दबाव न आए।
हमारे फ्लेक्सी कैप फंड को जो प्यार और भरोसा मिला है, उसके लिए हम निवेशकों के आभारी हैं। हमारी सबसे बड़ी सीख है- ‘पारदर्शिता और स्पष्ट पोजीशनिंग’ है। हम निवेशकों को लगातार यह बताते रहते हैं कि उनका पैसा कहां और क्यों लगा है। स्मॉलकैप फंड में भी हम उसी फ्रेमवर्क और फिलॉसफी को आगे बढ़ाएंगे जो हमारे फ्लेक्सी कैप की सफलता का आधार रही है। हम अपने 'कोर' (Research-driven selection) से कभी समझौता नहीं करते, चाहे बाजार की स्थिति कैसी भी हो।
यह हमारी टीम की सबसे बड़ी ताकत है। हमारी टीम में औसत अनुभव 15 से 20 साल का है। हमारे फाउंडर सुनील सिंघानिया का दशकों का अनुभव हमें एक अलग नजरिया देता है। हम केवल स्क्रीनर्स या एल्गोरिदम पर भरोसा नहीं करते। हम कंपनियों के साथ नियमित इंटरेक्शन करते हैं, सेक्टर की बारीकियों को समझते हैं और 'बॉटम-अप' रिसर्च करते हैं। स्मॉलकैप में कई ऐसी कंपनियां होती हैं जो आज बाजार की नजर में नहीं हैं, लेकिन उनके फंडामेंटल्स बहुत मजबूत होते हैं। हम उन्हीं हीरों को तराशने का काम करते हैं।
स्मॉलकैप में गिरावट का जोखिम हमेशा रहता है, लेकिन इससे बचने के तीन मुख्य तरीके हैं। पहला- लंबी अवधि का निवेश: समय वोलैटिलिटी को कम कर देता है।
दूसरा- अनुशासित पोर्टफोलियो निर्माण: हम इंडिविजुअल स्टॉक और मार्केट कैप की सीमाएं तय करके लिक्विडिटी रिस्क को कम करते हैं।
तीसरा- स्टॉक सिलेक्शन: हम ऐसी कंपनियों पर दांव लगाते हैं जिनके पास मार्जिन ऑफ सेफ्टी हो, यानी जिनका वैल्यूएशन उनकी ग्रोथ के मुकाबले कम हो। अगर आपका सिलेक्शन सही है, तो बाजार की गिरावट में स्टॉक गिरेगा जरूर, लेकिन वह रिकवरी भी उतनी ही तेजी से दिखाएगा।
जैसा कि मैंने बताया, व्यक्तिगत स्टॉक की सीमा 3% (बायिंग) और 5% (होल्डिंग) रहेगी। सेक्टर कैपिंग के मामले में हम चाहते हैं कि फंड थोड़ा बाजार के साथ भी चले। इसलिए टॉप 4 सेक्टर्स में हमने डेविएशन को सीमित किया है, जिससे पोर्टफोलियो का 30-40% हिस्सा कम से कम मार्केट के रुझान के अनुरूप हो। इसके अलावा, लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए हम लार्जकैप का एक बफर और थोड़ा अतिरिक्त कैश (5-6%) रखेंगे।
रेगुलेटरी एक्शन का उद्देश्य मार्केट में स्पेकुलेशन (सट्टा) को कम करना और जेनुइन इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना है। लंबी अवधि में यह बाजार के लिए बहुत अच्छा है। जहां तक अंडरपरफॉर्मेंस की बात है, तो यह मुख्य रूप से अर्निंग्स ग्रोथ पर निर्भर करेगा। हमने पिछले कुछ महीनों में जो सुस्ती देखी थी, वह अब रिकवरी में बदल रही है। भारत की जीडीपी ग्रोथ और नॉमिनल अर्निंग्स ग्रोथ (10-15%) को देखते हुए, स्मॉलकैप में अंडरपरफॉर्मेंस लंबे समय तक टिकने की संभावना कम है, बशर्ते कंपनियां अपनी ग्रोथ डिलीवर करती रहें।
हम निवेशकों को व्यावहारिक (Realistic) रहने की सलाह देते हैं। अगर भारत की नॉमिनल जीडीपी 10-11% रहती है, तो लार्जकैप उसी दायरे में रिटर्न देंगे। लेकिन मिड और स्मॉलकैप में अवसर ज्यादा होते हैं, इसलिए वहां 2-4% का अतिरिक्त रिटर्न (अल्फा) मिल सकता है। हम कोशिश करेंगे कि अपने रिसर्च और सिलेक्शन के जरिए हम निवेशकों को बाजार के औसत से थोड़ा बेहतर रिटर्न दे सकें, लेकिन इसके लिए निवेशकों को 5-7 साल का धैर्य रखना होगा।
मैं आपको टारगेट नंबर देकर शायद खुश नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि हम 'नंबर गेम' की जगह 'अर्निंग्स' पर फोकस करते हैं। अगर अर्निंग्स ग्रोथ 12-15% रहती है, तो बाजार उसी अनुपात में बढ़ेगा। हमारा ध्यान इस बात पर है कि हम उन कंपनियों को चुनें जिनकी कमाई इंडेक्स से बेहतर हो। निवेशकों को सलाह है कि वे 2021-24 के बुल रन को बेंचमार्क न बनाएं और एक तर्कसंगत उम्मीद के साथ निवेश करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
Oops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.