रिटायरमेंट के समय लक्ष्य धन बढ़ाने से बदलकर नियमित और भरोसेमंद आय बनाने पर आ जाता है। इस संदर्भ में दो विकल्प सबसे अधिक चर्चा में रहते हैं। पहला है एन्युटी, जो एक लंबी अवधि का बीमा अनुबंध होता है। इसमें आप एकमुश्त रकम जमा करते हैं और बदले में आपको जीवनभर या तय समय तक गारंटीड आय मिलती है। यह बाजार में उतार–चढ़ाव और लंबी उम्र के जोखिम से सुरक्षा देता है।
दूसरा विकल्प है एसडब्ल्यूपी यानी सिस्टमेटिक विदड्रॉल प्लान। इसमें आप अपने म्यूचुअल फंड निवेश से नियमित अंतराल पर एक तय रकम निकालते हैं, जबकि बाकी पैसा फंड में निवेशित रहता है। यह फ्लेक्सिबेलिटी देता है और बाजार से जुड़ा होने के कारण विकास की संभावना भी बनाए रखता है। दोनों विकल्प रिटायरमेंट योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन पूर्वानुमान, लचीलापन और टैक्स के हिसाब से एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
एन्युटी का मुख्य उद्देश्य आपको मानसिक शांति देना होता है। एक बार खरीदने के बाद आपकी आय पहले से तय होती है और बाज़ार के उतार–चढ़ाव का इस पर असर नहीं पड़ता। इसी कारण यह जरूरी खर्चों जैसे भोजन, घर, बीमा प्रीमियम और स्वास्थ्य देखभाल जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
भारत में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, ऐसे में जीवनभर की आय का भरोसा कई लोगों के लिए सुकून देता है। लेकिन यह सुरक्षा कुछ सीमाओं के साथ आती है।
भारत में एन्युटी दरें अभी भी अन्य सुरक्षित निवेश विकल्पों की तुलना में कम हैं। निवेश की गई राशि आमतौर पर लॉक हो जाती है और निकालना मुश्किल होता है। इसके अलावा यदि आप महंगाई से जुड़ी या बढ़ती आय वाली एन्युटी नहीं लेते, तो समय के साथ आपकी वास्तविक क्रय-शक्ति कम होती जाती है। इसलिए एन्युटी सुरक्षा तो देती है, लेकिन लंबे समय में अधिक बढ़त नहीं दे पाती।
कैसे SWP नियंत्रण और बढ़त दोनों देता है?
एसडब्ल्यूपी को आप एक निकासी प्रणाली की तरह समझ सकते हैं। आप निकासी की रकम और समय खुद तय कर सकते हैं और चाहें तो इसे कभी भी बदल या रोक सकते हैं। आपका पैसा म्यूचुअल फंड में निवेशित रहने के कारण बढ़ता रहता है, जिससे आय महंगाई के साथ तालमेल बिठा सकती है। यही कारण है कि सेवानिवृत्त लोगों को इसमें लचीलापन, बेहतर रिटर्न की संभावना और अपने धन पर पूरा नियंत्रण मिलता है। हालांकि एसडब्ल्यूपी में जोखिम भी है।
बाज़ार लंबे समय तक गिरावट में रहा तो आपकी राशि और भविष्य की आय पर दबाव पड़ सकता है। इससे बचने के लिए बैलेंस्ड या मल्टी-एसेट फंड चुनना, कम निकासी दर रखना और एक-दो साल के खर्च अलग से लिक्विड फंड में रखना समझदारी माना जाता है। सही तरीके से प्रबंधित किया जाए, तो एसडब्ल्यूपी एन्युटी की तुलना में अधिक संभावित आय दे सकता है।
रिटायरमेंट में टैक्स के फर्क को समझना जरूरी
एन्युटी से मिलने वाली आय को सैलरी की तरह माना जाता है और यह पूरी तरह आपके टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होती है। इसमें रिटायरमेंट के बाद कोई विशेष टैक्स लाभ नहीं मिलता। दूसरी तरफ एसडब्ल्यूपी निकासी पर कैपिटल गेन नियम लागू होते हैं।
इक्विटी फंड पर एक लाख रुपये से ऊपर के दीर्घकालिक लाभ पर 10 प्रतिशत टैक्स लगता है और डेट फंड पर लाभ के प्रकार के अनुसार टैक्स स्लैब लागू होता है। कम टैक्स स्लैब वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए एसडब्ल्यूपी अक्सर अधिक टैक्स-एफ़िशिएंट साबित होता है, खासकर जब निकासी की योजना सावधानी से बनाई गई हो।
कौन-सी रणनीति सबसे बेहतर?
इसका कोई एक सार्वभौमिक जवाब नहीं है। एन्युटी स्थिरता देती है, जबकि एसडब्ल्यूपी लचीलापन और विकास की संभावना प्रदान करता है। कई वित्तीय विशेषज्ञ दोनों का मिश्रण अपनाने की सलाह देते हैं।
यानी जरूरी मासिक खर्चों के लिए एन्युटी लें और बाकी राशि को एसडब्ल्यूपी में निवेश करें ताकि वह बढ़ती रहे और जीवनशैली से जुड़े खर्च पूरे कर सके। इस तरह का संतुलन आपको सुरक्षा भी देता है और महंगाई व नियंत्रण दोनों पर समझौता करने की जरूरत भी नहीं रहती।
(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। यह किसी प्रकार की वित्तीय या निवेश सलाह नहीं है। निवेश करने से पहले अपने जोखिम प्रोफाइल का मूल्यांकन करें और योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें। बाजार की स्थितियां और नियम समय-समय पर बदल सकते हैं।)