शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरी खबर आई है। कोर्ट ने एक विधवा महिला की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह साफ कर दिया है कि अगर कोई ब्रोकर निवेशकों के शेयरों के साथ धोखाधड़ी करता है, तो उसकी जिम्मेदारी डिपॉजिटरी (CDSL/NSDL) की भी होगी। यह फैसला न केवल एक पीड़ित परिवार की जीत है, बल्कि उन हजारों निवेशकों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके पैसे कार्वी जैसे बड़े ब्रोकर डिफॉल्ट मामलों में फंसे हुए हैं।
क्या है पूरा मामला?
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात की रहने वाली दक्षा नरेंद्र भावसार और उनके पति ने रिलायंस और टीसीएस जैसे ब्लू-चिप शेयरों में निवेश किया था। उनके शेयर कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग के पास थे, लेकिन बाद में इन्हें 'बीआरएच वेल्थ क्रिएटर्स' (BRH Wealth Kreators) में ट्रांसफर कर दिया गया। साल 2019 में दक्षा के पति के निधन के बाद, ब्रोकर ने धोखाधड़ी करते हुए उनके पोर्टफोलियो से करीब 90 लाख रुपये के शेयर गायब कर दिए। ब्रोकर ने पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) का गलत इस्तेमाल कर इन शेयरों को बैंक के पास गिरवी रख दिया और लोन ले लिया। जब ब्रोकर ने लोन नहीं चुकाया, तो बैंक ने शेयर बेच दिए।
कोर्ट ने जिम्मेदारी तय की
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षा भावसार ने जब CDSL से मदद मांगी, तो उन्हें पुलिस के पास जाने को कह दिया गया। एनएसई (NSE) ने भी यह कहकर हाथ खड़े कर लिए कि कोई ट्रेडिंग नहीं हुई थी, इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते। अंत में मामला आर्बिट्रेशन और फिर हाई कोर्ट पहुंचा। बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप मारने ने CDSL की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ब्रोकर ने 'डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट' (DP) के तौर पर अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल किया है। कोर्ट ने माना कि ब्रोकर चूंकि डिपॉजिटरी का एजेंट होता है, इसलिए डिपॉजिटरी को निवेशक के नुकसान की भरपाई करनी होगी।
डिपॉजिटरी अब नहीं बच सकती
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह फैसला एक मिसाल बनेगा। आमतौर पर जब ब्रोकर डिफॉल्ट करते हैं, तो डिपॉजिटरी यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि गलती ब्रोकर की थी। लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि निवेशकों के शेयरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना डिपॉजिटरी की कानूनी जिम्मेदारी है। इस फैसले के बाद सीएसडीएल और एनएसडीएल जैसी संस्थाओं पर करोड़ों रुपये की देनदारी बन सकती है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में दर्जनों ब्रोकर डिफॉल्ट हुए हैं।
हजारों निवेशकों को बंधी उम्मीद
भारत में कार्वी, अनुग्रह और बीआरएच जैसे मामलों में हजारों निवेशकों के करोड़ों रुपये फंसे हुए हैं। कार्वी केस में अब भी करीब 300 करोड़ रुपये अटके हुए हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, डिपॉजिटरी एक्ट के तहत निवेशकों को 5 लाख रुपये तक के सीमित बैंक डिपॉजिट इंश्योरेंस से कहीं ज्यादा सुरक्षा मिली हुई है। यह फैसला उन बुजुर्गों और निवेशकों के लिए बड़ी राहत है जो सालों से रेगुलेटर और संस्थाओं के चक्कर काट रहे थे।