Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार 1 फरवरी 2026 को आम बजट पेश करेंगी। मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) लगातार 9वीं बजट पेश करने जा रही हैं। उन्होंने पहला बजट 5 जुलाई 2019 को पेश किया था। बजट 2026 से देश के अलग अलग सेक्टर्स के लोगों को काफी उम्मीदें हैं। आज हम आपको बजट से जुड़ी एक परंपरा के बारे में बता रहे हैं, जो टूट चुकी है। दरअसल, पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग पेश किया जाता है। फिर जब मोदी सरकार केंद्र में आई तो साल 2017 में रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया।
इतिहास में इस विलय को सबसे बड़े सुधारों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि रेल बजट का विलय केवल एक प्रशासनिक या कागजी बदलाव नहीं था, बल्कि भारतीय रेलवे को एक घाटे वाले विभाग से निकालकर एक आधुनिक और कुशल परिवहन ढांचे में बदलने की दिशा में उठाया गया कदम है। आज वंदे भारत, अमृत भारत स्टेशन योजना और कवच प्रणाली जैसी सफलताएं इसी वित्तीय मजबूती का परिणाम हैं। सालों तक अलग से पेश किए जाने के बाद, मोदी सरकार ने इस परंपरा को क्यों खत्म कर दिया और इसका क्या असर हुआ, आइये आपको यहां डिटेल में जानते हैं।
1924 में शुरू की गई थी रेलवे के लिए अलग बजट की परंपरा
रेलवे के लिए अलग बजट की प्रथा 1924 में शुरू हुई थी। यह फैसला एकवर्थ समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया था। 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ रेलवे को एक बेहतर मैनेजमेंट सिस्टम में लाए थे। इसके बाद उन्होंने 1924 में इसे आम बजट से अलग पेश करने का फैसला किया तब से लेकर साल 2016 तक यह अलग-अलग पेश किया जाता रहा। भारत को आजादी मिलने के बाद पहला रेल बजट 1947 में देश के पहले रेल मंत्री जॉन मथाई ने पेश किया था। मथाई ने भारत के वित्त मंत्री के रूप में दो आम बजट भी पेश किए थे।
साल 2017 में रेल बजट को आम बजट में किया गया शामिल
मोदी सरकार ने यह बड़ा बदलाव साल 2017 में किया था, जिसके बाद से अब तक रेलवे बजट और आम बजट एक साथ पेश होता आ रहा है। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दोनों बजट को एक साथ पेश किया था। दोनों बजट को एक साथ पेश करने की सिफारिश नीति आयोग ने सरकार से की थी, जिसके बाद से अब तक यह परंपरा चली आ रही है। 2016 में रेल मंत्री रहे पीयूष गोयल ने आखिरी बार रेल बजट पेश किया था।
विलय के पीछे की असली वजह क्या हैं?
सरकार ने जब रेल बजट को आम बजट में मिलाया तो उसके पीछे कई महत्वपूर्ण तर्क दिए गए थे। सबसे बड़ी वजह यह थी कि अलग बजट होने के कारण रेलवे को हर साल सरकार को लाभांश यानी डिविडेंड देना पड़ता था। विलय के बाद रेलवे को इस बोझ से मुक्ति मिल गई। इसके अलावा अलग बजट होने की वजह से रेलवे की योजनाओं को लागू करने में बहुत समय लगता था क्योंकि वित्त मंत्रालय और रेल मंत्रालय के बीच तालमेल बिठाने में लंबी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता था। अब एक ही बजट होने से फंड का आवंटन और परियोजनाओं की मंजूरी पहले के मुकाबले ज्यादा आसान और तेज हो गई है।