
Budget 2026: देश में यूनियन बजट को लेकर हमेशा उत्सुकता रहती है. इस बार भी 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण वित्त वर्ष 2026-27 का बजट पेश करने जा रही हैं। यह पीएम नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में उनका दूसरा फुल-फ्लेज्ड बजट होगा। बजट केवल किसी दस्तावेज का नाम नहीं, बल्कि यह देश के कर्ज और खर्च का आधिकारिक लेखा-जोखा होता है। इसलिए इसे भारत के सबसे संवेदनशील दस्तावेजों में माना जाता है। भारत में पहली बार बजट ब्रिटिश शासन के दौरान 7 अप्रैल 1860 को पेश किया गया था। उस समय भारत के वित्त मंत्री जेम्स विल्सन ने यह बजट रखा था।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश हुकूमत की आर्थिक कमर तोड़ दी थी। सैन्य खर्च इतना बढ़ गया था कि खजाना खाली हो गया। इस घाटे की भरपाई के लिए 28 नवंबर 1859 को जेम्स विल्सन को भारत बुलाया गया। उन्होंने 7 अप्रैल 1860 को देश का पहला बजट पेश किया और 'इनकम टैक्स' की नींव रखी।
जिन लोगों की सालाना आय ₹200 से कम थी, उन्हें टैक्स से छूट दी गई थी। वहीं 200 रुपये से ज्यादा कमाने वाले हर व्यक्ति को सरकार को टैक्स देना पड़ता था। उस वक्त आय पर 2% से 4% तक का टैक्स लगाया गया था। जेम्स विल्सन ने टैक्स लगाने के पीछे यह तर्क दिया था कि ब्रिटिश शासन भारतीयों को व्यापार के लिए एक 'सुरक्षित माहौल' दे रहा है, इसलिए इस सुरक्षा के बदले फीस (टैक्स) लेना जायज है।
आजाद भारत का पहला बजट वित्त मंत्री, सर आर.के. शनमुखम चेट्टी ने 26 नवंबर, 1947 को पेश किया था। इस बजट का खर्च ₹197.29 करोड़ रुपये था। इस बजट की राशि भले ही कम थी, लेकिन इसमें कई बड़े फैसले लिए गए थे। यह बजट ऐसे समय में आया, जब देश विभाजन की त्रासदी झेल रहा था। चारों तरफ दंगे, विस्थापन, आर्थिक अनिश्चितता और सीमित संसाधन थे। यही वजह है कि यह बजट पूरे एक साल का नहीं, बल्कि सिर्फ साढ़े सात महीने के लिए तैयार किया गया था।
आजाद भारत का पहला बजट सिर्फ 171.15 करोड़ रुपए का था। पहले बजट से जुड़े अहम आंकड़ों पर नजर डालें तो कुल रेवेन्यू (आय) 171.15 करोड़, कुल खर्च 197.29 करोड़ रुपये था, जो कुछ रिकॉर्ड में 197.39 करोड़ भी दर्ज है। तब राजकोषीय घाटा 24.59 करोड़ और रक्षा बजट 92.74 करोड़ का था। उस दौर में कुल खर्च का करीब 46-50% हिस्सा सिर्फ रक्षा पर खर्च हुआ, क्योंकि देश को नई सीमाओं और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।
बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने 1991 में अपना पहला बजट संसद में पेश किया था। भारत के इतिहास में इस बजट को गेम चेंजर बजट कहा जाता है। मनमोहन सिंह ने इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पॉलिसी में बदलाव कर भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया। इसी बजट की बदौलत भारत की अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी और देश में आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का खाका तैयार हुआ। दरअसल इससे पहले देश की अर्थव्यवस्था कई कारणों से पिछड़ी हुई थी। शेयर बाजार में घपले, चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध, आयात के लिए जटिल लाइसेंसिंग सिस्टम और विदेशी पूंजी निवेश पर सरकारी रोक जैसे कई कारण थे, जो अर्थव्यवस्था की रफ्तार को थामे हुए थे।
मनमोहन सिंह ने तीन कैटेगरी में बड़े बदलाव किए। ये थे - उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण। साथ ही मनमोहन सिंह ने इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पॉलिसी में भी बड़े बदलाव किए। इम्पोर्ट लाइसेंस फीस को घटाया गया और एक्सपोर्ट को प्रमोट किया गया। कस्टम ड्यूटी को 220 फीसदी से घटाकर 150 फीसदी किया गया। बजट में बैंकों पर आरबीआई के नियंत्रण को भी कम किया गया। बैंकों को जमा और कर्ज पर इंटरेस्ट रेट और कर्ज की राशि तय करने का अधिकार दिया गया। नए निजी बैंक खोलने के नियम भी आसान किए गए। इससे देश में बैंकों का भी विस्तार हुआ।
1997-98 के केंद्रीय बजट का भारत के आर्थिक इतिहास में एक खास स्थान है। 28 फरवरी 1997 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश किए गए बजट को 'ड्रीम बजट' के नाम से जाना जाता है। ऐसे समय में जब भारतीय अर्थव्यवस्था नई गति की तलाश में थी। इस बजट में टैक्स सुधार जबरदस्त तरीके से हुए थे। ये बजट प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के कार्यकाल के दौरान पेश किया गया था।
व्यक्तिगत टैक्स दरों में तेजी से कमी की गई, जिससे व्यक्तियों के लिए टैक्स देना आसान हो गया और अधिक लोगों को टैक्स सिस्टम में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। कॉर्पोरेट टैक्स दरों में भी कटौती की गई और व्यापार के माहौल को बेहतर बनाने और निवेश आकर्षित करने के लिए सरचार्ज हटा दिए गए थे।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साल 2025-26 के आम बजट में इनकम टैक्स में बड़ी राहत की घोषणा की थी। इसमें नई टैक्स रिजीम में सालाना 12 लाख तक की आमदनी को टैक्स फ्री कर दिया। सैलरी क्लास के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन 75 हज़ार रुपये ही रखा गया है, इस लिहाज़ से सैलरी क्लास की 12 लाख 75 हज़ार रुपये तक की इनकम टैक्स फ्री हो गई।
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