नाम बड़े और दर्शन छोटे: बजट में मिले पैसे खर्च करने में मोदी सरकार के मंत्रालयों का ये रिकॉर्ड देख सिर पीट लेंगे

Budget Spending Data: बजट में मंत्रालयों को कितने पैसे मिले, इसकी तो खूब चर्चा होती है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण तो यह है कि आखिर बजट में मिले पैसे खर्च हो भी रहे हैं या नहीं। केंद्र सरकार के कई मंत्रालय इस मामले में निराशाजनक प्रदर्शन कर रहे हैं।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड14 Feb 2026, 10:26 AM IST
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण।(PTI)

Fiscal Deficit: सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। मंत्रालयों के लिए हर वर्ष बजट आवंटित होते हैं। इस पर चर्चा भी होती है कि किस मंत्रालय को कितने पैसे मिले। यह तुलना भी की जाती है कि किसी मंत्रालय को पिछले वर्ष के मुकाबले कितना आवंटन हुआ। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसकी बहुत चर्चा नहीं होती कि मंत्रालयों को हर वर्ष जो पैसे मिलते हैं, क्या वह खर्च भी हो पाते हैं?

100 में सिर्फ 20 रुपये ही खर्च कर रहे हैं मंत्रालय

इसकी सच्चाई जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि केंद्र सरकार के एक-दो नहीं बल्कि लगभग डेढ़ दर्जन मंत्रालय कई वर्षों से बजट से मिले पैसे को खर्च ही नहीं कर पा रहे हैं। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि कुछ-कुछ मंत्रालय तो बजट आवंटन का सिर्फ 20 पर्सेंट ही खर्च कर पा रहे हैं और उनका 80 पर्सेंट पैसा सरकारी खजाने में वापस हो जा रहा है। आइए आज ऐसे ही मंत्रालयों के प्रदर्शन का लेखा-जोखा लेते हैं।

यह भी पढ़ें | Budget 2026: EPF से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव, टैक्स का झंझट खत्म

बढ़ती जा रही है खजाना वापसी की परिपाटी

वित्त वर्ष 2009-10 से उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार के कुल 53 मंत्रालयों में करीब-करीब एक तिहाई यानी 18 मंत्रालयों ने अपने-अपने बजट आवंटनों के 80% से भी कम खर्च किए हैं। बड़ी चिंता की बात है कि हाल के वर्षों में यह परिपाटी बढ़ती जा रही है। वित्त वर्ष 2022-23 से वित्त वर्ष 2024-25 के बीच 12 से 13 प्रतिशत मंत्रालयों ने अपने बजट आवंटनों के आधे से भी कम खर्च किए हैं। 2010 से 2019 के दशक में इस हद तक असफल रहने वाले मंत्रालयों का आंकड़ा सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत हुआ करता था।

यह भी पढ़ें | 10 लाख नौकरियां, शादी के लिए ₹1 लाख... योगी सरकार ने बजट में खोला खजाना

कोविड के बाद और खराब हुई स्थिति

वित्त वर्ष 2024-25 में करीब आधी संख्या में मंत्रालयों से उनके बजट आवंटन का 80 प्रतिशत से कम खर्च हुआ। नरेंद्र मोदी सरकार ने कोविड से पहले के वर्षों में बजट आवंटनों के खर्च में बेहतर प्रदर्शन किया था। तब 10 से 16 प्रतिशत मंत्रालय बजट आवंटनों के 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से खर्च करने में असफल रहे थे। यानी उन्होंने बजट आवंटनों के 80 प्रतिशत तक खर्च दिए थे।

कुछ मंत्रालयों की बड़ी दयनीय दशा

मजे की बात है कि इस सूची के मंत्रालयों के नाम वर्ष दर वर्ष बदलते रहते हैं। हालांकि, कुछ ऐसे भी मंत्रालय हैं जो दूसरों के मुकाबले इस लिस्ट में ज्यादा बार अपने नाम दर्ज करवा चुके हैं। ये ऐसे मंत्रालय हैं जिन्होंने पिछले चार वित्त वर्ष में कम से कम दो बार अपने बजट आवंटनों का 60 प्रतिशत से भी कम खर्च किए हैं। अल्पसंख्यक मंत्रालय और पर्यटन मंत्रालय तो लगातार अपने लक्ष्यों से दूर रहे हैं।

यह भी पढ़ें | बजट 2026: जबरन अधिग्रहीत जमीन का मुआवजा अब पूरी तरह टैक्स-फ्री!

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय भी अपने बजट के बड़े हिस्से को खर्च करने से लगातार चूकते रहे हैं। इसी तरह, जल शक्ति मंत्रालय, और कौशल विकास मंत्रालय भी कई वर्षों से अपने बजट आंवटनों के पूर्ण उपयोग में असफलता ही दिखा रहे हैं।

इन सभी मंत्रालयों के प्रदर्शन बताते हैं कि बजट में तो विकास योजनाओं की बड़ी सुहावनी तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने में भारी शिथिलता बरती जा रही है। बजट आवंटनों की बड़ी राशि खर्च करने में लगातार असफलता से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के कार्यक्रमों को परवान चढ़ाने में बहुत देरी हो रही है।

सरकार का समाज कल्याण पर फोकस, लेकिन खर्च करने में पिछड़े मंत्रालय

मोदी सरकार का फोकस समाज कल्याण पर कितना ज्यादा है, इसकी झलक भी बजट आवंटनों के खर्च से ही दिखती है। सामाजिक क्षेत्र के 14 में से 10 मंत्रालयों और विभागों के खर्चों पर नजर डालने से पता चलता है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बजट आवंटन का 107.4 पर्सेंट जबकि संस्कृति मंत्रालय ने 103.4 पर्सेंट खर्च करके सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है।

आंकड़ों से साफ है कि इन दोनों मंत्रालयों ने बजट आवंटन से ज्यादा खर्च किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय ने भी 90 प्रतिशत से ज्यादा के खर्चों के साथ बेहतर प्रदर्शन किए हैं। सोशल सेक्टर के मंत्रालयों में कौशल विकास ने महज 59.1 प्रतिशत खर्च के साथ सबसे खराब प्रदर्शन किया है।

मोदी सरकार ने बुनियादी ढाचों के विकास पर जबर्दस्त खर्च किया है। अनाज से लेकर नकदी वितरण तक के कार्यक्रमों पर भी सरकार का खास फोकस रहता है। मोदी सरकार की 11 प्रमुख योजनाओं के विश्लेषण से जानकारी मिलती है कि उनमें छह योजनाओं के लिए पिछले चार वर्ष से बजट से मिले पैसे का 90 प्रतिशत से भी कम खर्च हो रहा है।

हर घर नल पहुंचाने वाली योजना जल जीवन मिशन पर इन चार वर्षों में आवंटन के सिर्फ 62 प्रतिशत खर्च हो पाए हैं। स्वच्छ भारत मिशन के लिए यह आंकड़ा 63 प्रतिशत तो पीएम आवास योजना पर 78 प्रतिशत का आंकड़ा है।

क्या यह वित्तीय घाटे को पाटने का तिकड़म है?

मोदी सरकार की इस बात के लिए प्रशंसा की जाती है कि उसने वित्तीय घाटे को कम करने में सफलता पाई है। कोविड महामारी के वित्त वर्ष 2020-21 में भारत सरकार का वित्तीय घाटा जीडीपी का 9.16 प्रतिशत था जो वित्त वर्ष वित्त वर्ष 2026-27 तक 4.31 प्रतिशत पर आ गया है। लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि सरकार के कई मंत्रालय खर्च करने में बहुत पीछे हैं। आंकड़े गवाह हैं कि वित्तीय समेकन का बड़ा हिस्सा खर्चों में कटौती से आया है ना कि कमाई बढ़ाकर।

वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार के वित्तीय अनुशासन की प्रशंसा हुई, लेकिन इनकम टैक्स और जीएसटी में कटौती से वित्त वर्ष 2026-27 में रेवेन्यू पर बड़ा असर पड़ा। इस कारण वित्तीय घाटे में सिर्फ 5 बेसिस पॉइंट की कटौती के लिए खर्चों में जीडीपी के 30 बेसिस पॉइंट की बड़ी कटौती करनी पड़ी। सवाल है कि क्या सरकार के खर्चों पर अब वैश्विक अनिश्चतताओं का असर भी देखने को मिलेगा?

यह मिंट की रिपोर्ट है। अंग्रेजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Get Latest real-time updates

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

बिजनेस न्यूज़मनीनाम बड़े और दर्शन छोटे: बजट में मिले पैसे खर्च करने में मोदी सरकार के मंत्रालयों का ये रिकॉर्ड देख सिर पीट लेंगे
More
बिजनेस न्यूज़मनीनाम बड़े और दर्शन छोटे: बजट में मिले पैसे खर्च करने में मोदी सरकार के मंत्रालयों का ये रिकॉर्ड देख सिर पीट लेंगे