UPI पर अलग-अलग दरों से चार्ज लगाने की मांग संसद तक पहुंची, जानें पूरा मामला

UPI: एक संसदीय कमेटी ने फंडिंग में भारी कमी और धीमी होती विकास दर की समस्या से निपटने के लिए UPI लेन-देन पर अलग-अलग दरों वाले शुल्क लगाने की सिफ़ारिश की है। इंडस्ट्री का तर्क है कि सब्सिडी से लागत का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा हो पाता है।

Jitendra Singh( विद इनपुट्स फ्रॉम लाइवमिंट.कॉम)
पब्लिश्ड30 Mar 2026, 02:21 PM IST
UPI की तेज ग्रोथ अब धीमी पड़ने लगी है।
UPI की तेज ग्रोथ अब धीमी पड़ने लगी है।

UPI: आज जमाना डिजिटलाइजेशन का है। सारी चीजें ऑनलाइन हो रही हैं। बिल पेमेंट से लेकर खरीदारी करते वक्त भी लोग ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन पेमेंट करते हैं। मोबाइल में UPI ऐप हो तो और जल्दी पेमेंट हो जाता है। अब इस पेमेंट पर शुल्क लग सकता है। एक संसदीय कमेटी ने रियल-टाइम पेमेंट नेटवर्क पर होने वाले लेन-देन के लिए फीस लगाने की सिफारिश की है। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐसा कदम होगा, जिससे सरकार की 'सबके लिए मुफ़्त' (free-for-all) वाली नीति बदल सकती है।

बता दें कि एक नई कमेटी की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि Unified Payments Interface (UPI) को बनाए रखने के लिए एक 'टियर्ड रेवेन्यू मॉडल' जरूरी है, क्योंकि बजट में मिलने वाली रियायतें, रखरखाव पर होने वाले बढ़ते खर्च को पूरा करने में नाकाम साबित हो रही हैं। साल 2025 में UPI के जरिए 3000 ट्रिलियन का लेन-देन किया गया था। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने UPI को एक 'सार्वजनिक हित' के तौर पर समर्थन दिया है। वहीं बैंकों और फिनटेक कंपनियों की ओर संचालित इसके बुनियादी ढांचे पर भारी फंडिंग की कमी का बोझ बना हुआ है।

MDR की मांग

इंडस्ट्री के कई लोग लंबे समय से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की मांग कर रहे थे, संसदीय समर्थन को सुधारों का एक संकेत मान रहे हैं। FY24 में, पूरे इकोसिस्टम ने मर्चेंट ट्रांज़ेक्शन को प्रोसेस करने के लिए कुल मिलाकर 12,000 करोड़ खर्च किए, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ़ 3,000 करोड़ ही मिले। इससे घाटा हुआ है। ऐसे में प्राइवेट प्लेयर्स का कहना है कि यह इनोवेशन और सुरक्षा में रुकावट आई है।

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UPI की रफ्तार में सुस्ती

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब UPI की तेज ग्रोथ अब धीमी पड़ने लगी है। उम्मीद जताई जा रही है कि FY26 तक इसका वॉल्यूम ग्रोथ घटकर 25 फीसदी रह जाएगा। दरअसल, सरकारी मदद से लागत का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही कवर हो पाता है। ऐसे में एक टियर वाली फी संरचना (tiered fee structure) लागू करने का मकसद छोटे विक्रेताओं को सुरक्षा देना है। इसके साथ ही पेमेंट सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनियों को कमर्शियल ट्रैफ़िक से कमाई करने का मौका देना है।

क्या सरकार बना रही है माहौल?

इस मामले में इंडस्ट्री के सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि समिति के सुझाव अभी-अभी आए हैं। अब यह देखना होगा कि सरकार इन सुझावों पर चुप रहती है या फिर यह उनका तरीका है कि वे आधिकारिक तौर पर फीस लागू करने से पहले माहौल का जायजा लें और उद्योग जगत से प्रतिक्रिया हासिल करे। अपनी रिपोर्ट में, स्थायी समिति ने कहा था कि सरकारी योजना के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन सहायता, उद्योग द्वारा किए गए खर्च का केवल 11% और उद्योग द्वारा वसूले जाने वाले संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) का 14% है।

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क्या है पूरा मामला?

अभी सरकार की पॉलिसी के अनुसार UPI ट्रांजेक्शन करने पर यूजर्स या फिर बिजनेसमैन को कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं देना होता है। इसके बदले सरकार इन कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए सब्सिडी देती है। लेकिन कंपनियों का कहना है कि यह सब्सिडी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। अब पेमेंट इंडस्ट्री का मानना है कि UPI के बढ़ते विस्तार को देखते हुए पिछले साल आवंटित की गई 1,500 करोड़ रुपये की सब्सिडी काफी कम रही। पेमेंट कंपनियों को उम्मीद थी कि यह राशि और बढ़ाई जानी चाहिए।

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कहां लागू होता है MDR चार्ज?

MDR चार्ज फिलहाल बड़े व्यापारियों और ब्रांडेड स्टोर्स पर लागू होगा। छोटे दुकानदार, लोकल वेंडर्स और किराना स्टोर इससे बाहर हैं। यानी आम आदमी की छोटी-छोटी खरीदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

जानिए MDR क्या है

MDR वह शुल्क है जो दुकानदार को डिजिटल पेमेंट (जैसे UPI, कार्ड आदि) स्वीकार करने पर देना पड़ता है। यानी जब आप मोबाइल या कार्ड से भुगतान करते हैं, तो उस सुविधा के बदले दुकानदार से लिया जाने वाला छोटा सा चार्ज ही MDR कहलाता है।

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