
बॉलिवुड एक्टर राजपाल यादव चेक बाउंस के मामले में जेल चले गए। उन पर तो करोड़ों रुपये का बकाया था, लेकिन छोटी रकम के भुगतान में हुई चूक पर भी कानून का शिकंजा कस जाता है। इतना ही नहीं, कानूनी-कार्रवाई की नौबत आने से पहले चूक होते ही जुर्माने पर जुर्माना जुड़ता जाता है। इसलिए अगर आपने चेक के जरिए या ऑनलाइन मैंडेट दिया है तो उसे हल्के में न लें बल्कि उसे हर हाल में वक्त से पूरा करें।
बी. शंकर एडवोकेट्स एलएलपी में प्रिंसिपल असोसिएट प्रेरणा रॉबिन कहती हैं, 'तकनीकी तौर पर एक बार मैंडेट फेल होना या चेक बाउंस कर जाना निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (एनआई एक्ट) के सेक्शन 13 के तहत मुकदमा शुरू करने का पर्याप्त आधार होता है। बशर्ते ऐसा होने पर कानूनी नोटिस दिया जाए और इसके 15 दिनों के अंदर पेमेंट नहीं हो पाए।' इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में प्रेरणा रॉबिन का यह बयान प्रकाशित है। इसमें वो आगे कहती हैं कि बाउंस चेक के मामले में किसी को दो साल की सजा, चेक अमाउंट के दोगुने रकम तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
यूनिवर्सल लीगल के फाउंडर अपूर्व अग्रवाल स्पष्ट करते हैं कि जेल और जुर्माने का प्रवधान सिर्फ चेक बाउंस के केस में ही है। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार अपूर्व ने बताया, 'निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत सिर्फ चेक बाउंसिंग को ही कानून का उल्लंघन माना जाता है। अगर आपने ऑनलाइन मैंडेट पूरा नहीं किया और ईएमआई पेमेंट नहीं हो सका तो आपका क्रेडिट स्कोर खराब होगा और जुर्माना देना होगा, लेकिन कानूनी-कार्रवाई नहीं होगी।'
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 के सेक्शन 138 में कम पैसे होने की वजह से चेक के डिसऑनर होने पर सजा का प्रावधान है, जिसमें दो साल तक की जेल, चेक की रकम का दोगुना तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसके लिए मेमो मिलने के 30 दिनों के अंदर लीगल नोटिस भेजना होता है, जिसमें पेमेंट के लिए 15 दिन का समय होता है।
मुश्किल यह भी है कि कानूनी पचड़े में फंसने से पहले जुर्माने पर जुर्माना लगना शुरू हो जाता है। प्रेरणा कहती हैं, 'जब आप नैशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस (NACH) मैंडेट या चेक पेमेंट में चूक जाते हैं तो बैंक ही 250 से 750 रुपये तक का चार्ज लगा देता है। और ऐसा जितनी बार होगा, बैंक उतनी बार यह रकम जोड़ता चला जाएगा।' साथ ही, ऑटो डेबिट के प्रयास फेल होने पर उसकी अलग से गिनती होती है।
ध्यान रहे कि जब हम कर्ज या उधार को कई किस्तों में चुकाने के लिए ऑनलाइन मैंडेट देते हैं तो उसे नाच सिस्टम के जरिए ही हैंडल किया जाता है। अपूर्व अग्रवाल कहते हैं, 'अगर चेक ईएमआई, रेंट या क्रेडिट कार्ड पेमेंट के लिए था तब जिसके पास पेमेंट जाना था, वह बाउंस फी और ब्याज के रूप में भी एक्स्ट्रा चार्ज ले सकता है।'
दूसरी समस्या क्रेडिट स्कोर कमजोर होने की भी होती है। अगर आप अपना ईएमआई या क्रेडिट कार्ड बिल समय पर नहीं चुका पाते हैं तो बैंक आपको डिफॉल्टर या डीपीडी (डेज पास्ट ड्यू) घोषित कर देगा। अपूर्व कहते हैं, 'ऐसा होते ही आपका क्रेडिट स्कोर एकबारगी 50 से 70 पॉइंट घट जाएगा।'
इसका असर यह होगा कि आगे चलकर आपको लोन या क्रेडिट कार्ड लेने में दिक्कत होगी। लोन मिल भी जाए तो पूरी आशंका होगी कि ब्याज दर ज्यादा देना पड़े। एक बात यह भी है कि एकाध बार आप वक्त से पेमेंट करने से चूक गए तो हल्के-फुल्के झटके खाकर आप संभल भी सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा बार-बार हुआ तो फिर परेशानी बड़ी हो जाएगी। फिर तो लोन लेना और खासकर होम लोन जैसा बड़ा अमाउंट मिलना तो लगभग असंभव हो जाएगा।
ऐसे में अगर आपके अकाउंट में पर्याप्त पैसे नहीं हों और चेक क्लियरेंस का वक्त आने वाला हो तो होशियारी इसी में है कि आप तुरंत बैंक या जिसके नाम भी चेक जारी किया है, उससे संपर्क करें और उसे चेक को क्लियरेंस से वापस लेने का आग्रह करें।
ऐसा करने से आपको पेमेंट के लिए कुछ और समय की मोहलत मिल सकती है और सेक्शन 138 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू होने का खतरा टल सकता है। अगर कर्जदाता आपके आग्रह को स्वीकार नहीं भी करता है तब आपको कम से कम कोर्ट से राहत मिलने की उम्मीद बनी रहेगी। आप कोर्ट को बता पाएंगे कि आपकी मंशा चेक डिसऑनर करवाने की नहीं थी, इसलिए आपने कर्जदाता से संपर्क किया था।
ऑटो डेबिट के मामले में भी एक सतर्कता बरतनी चाहिए। आपको चेक करना चाहिए कि आपकी जितनी ईएमआई है, क्या आपके बैंक अकाउंट से उतनी रकम की ऑटो डेबिट लिमिट है? अगर नहीं है तो ऑटो डेबिट लिमिट को तुरंत बढ़ा दें। नहीं तो ऑटो डेबिट का प्रयास अफसल रहेगा और आप पर पेनल्टी लग जाएगी। इतना ही नहीं, अगर आपने डेली डेबिट लिमिट पार कर ली है तब भी आपकी ईएमआई ऑटो डेबिट होने में रुकावट आ सकती है।
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