
Car on loan vs cash: आज के समय में अपनी कार होना सिर्फ शौक नहीं, बल्कि जरूरत जैसा बन चुका है। ऑफिस जाना हो, बच्चों को स्कूल छोड़ना हो या अचानक कहीं निकलना हो, अपनी गाड़ी का कंफर्ट अलग ही होता है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की टेंशन खत्म, कैब कैंसिल होने का डर नहीं और समय की भी बचत। लेकिन जब कार खरीदने की बारी आती है तो सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है, क्या पूरी रकम देकर कैश में गाड़ी ले लें या कार लोन का सहारा लें?
मान लीजिए आपको ₹15 लाख की कार खरीदनी है और आपके पास उतनी ही सेविंग्स भी है। अब आपके सामने दो रास्ते हैं या तो पूरी रकम कैश में देकर कार घर ले आएं या फिर लोन लेकर गाड़ी खरीदें और अपनी बचत को कहीं और निवेश करें। पहली नजर में कैश ऑप्शन आसान और सुकून देने वाला लगता है, क्योंकि EMI का झंझट नहीं रहेगा। लेकिन क्या वाकई यही बेहतर फैसला है?
अगर आप लोन पर कार खरीदना चाहते हैं तो, आपको 9% ब्याज दर पर 5 साल के लिए लोन मिल जाएगा जिसमें आपको करीब ₹3,68,252 ब्याज के रूप में चुकाने होंगे। आपकी मासिक EMI लगभग ₹31,138 बनेगी। इस तरह 5 साल में कुल भुगतान ₹18,68,252 हो जाएगा। यानी कार की कीमत से करीब साढ़े तीन लाख रुपये ज्यादा। ध्यान रहे ब्याज दर आपके सिबिल स्कोर पर निर्भर करती है। पहली नजर में यह महंगा सौदा लगता है, क्योंकि कैश में तो सिर्फ ₹15 लाख ही देने हैं।
अब मान लीजिए आपने लोन नहीं लिया और ₹15 लाख सीधे कार पर खर्च कर दिए। आपको EMI नहीं देनी पड़ेगी, यह सही है। लेकिन अगर आप वही ₹15 लाख बैंक में 5 साल की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में 6.75% ब्याज पर लगाते, तो मैच्योरिटी पर यह रकम लगभग ₹20,95,390 हो जाती। यानि आपकी बचत करीब ₹5,95,390 बढ़ जाती।
सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर और MyFundSIP की फाउंडर पूजा पटेल के मुताबिक, यही सोच अक्सर मिडिल क्लास की सबसे बड़ी गलती बन जाती है। हमें लगता है कि जब बैंक अकाउंट में पूरे ₹15 लाख पड़े हैं तो कार के लिए लोन क्यों लें? सीधा कैश दे देते हैं और EMI से छुटकारा पा लेते हैं। लेकिन असल में आप अपनी पूरी लिक्विडिटी खत्म कर रहे होते हैं और पैसा एक ऐसी एसेट में डाल देते हैं जिसकी कीमत समय के साथ घटती जाती है। अगर ₹15 लाख कैश देकर कार ले ली, तो पांच साल बाद वही कार करीब ₹7 लाख की रह जाएगी। यानी पैसा भी घटा और हाथ में कैश भी नहीं बचा।
पूजा पटेल समझाती हैं कि समझदारी यह है कि पैसा सिर्फ खर्च न हो, बल्कि बढ़े भी। उदाहरण के तौर पर ₹15 लाख की कार लेनी हो तो ₹5 लाख डाउन पेमेंट दें और ₹10 लाख का लोन लगभग 9% ब्याज पर लें। जो ₹10 लाख आपने खर्च नहीं किए, उसे किसी अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगा दें। पांच साल में लोन पर करीब ₹2.45 लाख ब्याज देना पड़ेगा, लेकिन अगर निवेश पर औसतन 12% रिटर्न मिलता है तो वही ₹10 लाख करीब ₹17.6 लाख बन सकते हैं। यानी लोन चुकाने के बाद भी लगभग ₹4.3 लाख का फायदा बच सकता है।
अब यहां गणित थोड़ा दिलचस्प हो जाता है। लोन पर कुल भुगतान ₹18,68,252 है, जबकि FD मैच्योरिटी पर ₹20,95,390 मिल रहे हैं। यानि अगर आप लोन लेते हैं और अपनी बचत FD में डालते हैं, तो 5 साल बाद आपके पास लोन चुकाने के बाद भी अतिरिक्त राशि बच सकती है। इसका कारण यह है कि कार लोन का ब्याज 'रिड्यूसिंग बैलेंस' पर लगता है, यानी हर EMI के बाद बकाया रकम कम होती जाती है। वहीं FD पर ब्याज 'कंपाउंडिंग' के जरिए बढ़ती हुई राशि पर मिलता है। यही अंतर लंबी अवधि में बड़ा असर डालता है।
अगर आप मानसिक सुकून चाहते हैं और EMI से बचना चाहते हैं, तो कैश ऑप्शन ठीक लग सकता है। लेकिन अगर आप अपनी बचत को बढ़ाना चाहते हैं और सही प्लानिंग कर सकते हैं, तो लोन लेकर निवेश करना फायदेमंद हो सकता है। हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अलग होती है। इसलिए फैसला लेते समय अपनी आय, जोखिम उठाने की क्षमता और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में जरूर रखें।
कार खरीदना बड़ा फैसला है और इसे सिर्फ भावनाओं में बहकर नहीं लेना चाहिए। सही गणित और सही रणनीति अपनाकर आप न सिर्फ कार के मालिक बन सकते हैं, बल्कि अपनी बचत को भी बढ़ा सकते हैं।
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