
Dollar vs Rupee: दशकों से, वैश्विक व्यापार और वित्त पर अमेरिकी डॉलर का एकछत्र राज रहा है। दुनिया भर में तेल खरीदने से लेकर अंतरराष्ट्रीय कर्ज चुकाने तक, डॉलर ही एकमात्र विकल्प रहा है। लेकिन अब, इस व्यवस्था में एक शांत मगर शक्तिशाली बदलाव आ रहा है, जिसका नेतृत्व भारत कर रहा है।
आइए उन पांच सबसे हैरान करने वाले और प्रभावशाली तरीकों के बारे में जानते हैं, जिनका इस्तेमाल भारत रुपये को अंतरराष्ट्रीय बनाने और एक बहुध्रुवीय दुनिया के लिए एक नई वित्तीय संरचना का निर्माण करने के लिए कर रहा है। यह कहानी सिर्फ मुद्रा की नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक स्वायत्तता की है, जो दुनिया के वित्तीय समीकरणों को हमेशा के लिए बदलने की क्षमता रखती है।
रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण में सबसे नाटकीय बदलाव भारत-रूस व्यापार में देखने को मिला है। दिसंबर 2025 में हुए 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के बाद यह घोषणा की गई कि दोनों देशों के बीच होने वाला 96% वाणिज्यिक लेन-देन अब उनकी राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया और रूबल) में हो रहा है। यह आँकड़ा इसलिए क्रांतिकारी है क्योंकि यह कुछ महीनों के भीतर दुनिया की दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार के लगभग पूर्ण वि-डॉलरीकरण को दर्शाता है—एक ऐसी गति जो पहले अकल्पनीय थी।
पश्चिमी प्रतिबंधों और SWIFT जैसे वैश्विक भुगतान प्रणालियों से बचने की जरूरत ने इस बदलाव को तेजी दी। लेकिन अब यह सिर्फ एक अस्थायी समाधान नहीं रह गया है। दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अपब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर चल रहे हैं, और यह लक्ष्य राष्ट्रीय मुद्राओं पर आधारित व्यापार के बिना संभव नहीं है। यह कदम न केवल डॉलर-मुक्त व्यापार प्रणाली की व्यवहार्यता का परीक्षण कर रहा है, बल्कि इसे सफलतापूर्वक साबित भी कर रहा है।
पहली नजर में, मॉरीशस के साथ भारत की साझेदारी एक सामान्य द्विपक्षीय समझौता लग सकती है, लेकिन यह एक अत्यंत रणनीतिक कदम है जो कहीं ज्यादा गहरा है। मार्च 2025 में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) सिर्फ भारतीय और मॉरीशस के रुपये में लेनदेन निपटाने के बारे में नहीं है। इसका सबसे अप्रत्याशित और महत्वपूर्ण पहलू मॉरीशस में एक 'INR क्लियरिंग सेंटर' की स्थापना की योजना है।
यह पहल मॉरीशस को पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के लिए रुपया-आधारित लेन-देन का एक प्रमुख केंद्र बना देगी। इस योजना में इसे पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के साझा बाजार (COMESA) भुगतान प्रणाली के साथ एकीकृत करना भी शामिल है। यह कदम भारत की भू-राजनीतिक बुद्धिमत्ता को दर्शाता है, जिसमें उसने एक छोटे, भरोसेमंद भागीदार को एक पूरे महाद्वीप के लिए अपने वित्तीय विस्तार का केंद्र बनाकर चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' के जवाब में एक इकनॉमिक गेटवे बनाया है।
स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली (LCSS) को सफलतापूर्वक लागू करने के मामले में भारत-यूएई साझेदारी एक आदर्श मॉडल है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 100.06 अरब डॉलर को पार कर गया, जिससे यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया। यह रिश्ता सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक वित्तीय ढांचे पर टिका है।
इस ढांचे में न केवल बड़े व्यापारिक सौदों के लिए एलसीएसएस शामिल है, बल्कि भारत के यूपीआई को यूएई के नए इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म AANI के साथ एकीकृत करना भी शामिल है। यह दोहरा दृष्टिकोण अरबों डॉलर के तेल सौदों से लेकर यूएई में रहने वाले लाखों भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन (Remittance) तक, हर चीज को आसान और सस्ता बनाता है। यह साझेदारी साबित करती है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार न केवल संभव है, बल्कि बड़े पैमाने पर बेहद सफल भी हो सकता है।
रुपये को वैश्विक बनाने की यह पूरी कवायद केवल राजनयिक समझौतों पर नहीं, बल्कि भारत के भीतर हो रहे महत्वपूर्ण नियामक सुधारों पर टिकी है। इस पूरी मुहिम के पीछे की असली ताकत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रहा है। 2025 में, RBI ने पर्दे के पीछे दो ऐसे बड़े सुधार किए जिन्होंने इस पहल को सुपरचार्ज कर दिया। ये सुधार निम्नलिखित हैं।
1. बिना-अनुमति वाले SRVA: RBI ने अगस्त 2025 में विदेशी बैंकों के लिए विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते (SRVAs) खोलने के लिए भारतीय बैंकों पर अपनी पूर्व-अनुमति लेने की शर्त हटा दी। इस कदम ने नौकरशाही को कम किया और बैंकों को रुपया व्यापार को बहुत तेजी से शुरू करने का अधिकार दिया।
2. रुपये को आकर्षक बनाना: अक्टूबर 2025 में, इन खातों में सरप्लस रुपया रखने वाली विदेशी संस्थाओं को कॉरपोरेट बॉन्ड और कमर्शियल पेपर जैसे अधिक साधनों में निवेश करने की अनुमति दी गई। इससे उनके लिए भारतीय मुद्रा को रखना और उसमें लेनदेन करना अधिक लाभदायक हो गया।
ये तकनीकी बदलाव ही हैं जो पूरी प्रणाली को वैश्विक भागीदारों के लिए व्यावहारिक और आकर्षक बनाते हैं। RBI द्वारा अगस्त 2025 में SRVA खोलने के लिए पूर्व-अनुमति की शर्त को हटाना ही वह 'स्विच' था जिसने रूस और UAE जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्रा निपटान को नौकरशाही की बाधाओं से निकालकर वास्तविक समय के वाणिज्य में बदल दिया।
रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की कहानी भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति के बिना अधूरी है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) इस रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ है। यूपीआई का विस्तार केवल एक सूची नहीं है; यह एक सोची-समझी वैश्विक रणनीति है। आज, यूपीआई फ्रांस, यूएई, सिंगापुर, श्रीलंका, मॉरीशस, भूटान, नेपाल, कतर और जापान जैसे देशों में स्वीकार किया जाता है। फ्रांस में एफिल टॉवर पर इसकी मौजूदगी यूरोप में भारत की सॉफ्ट पावर का प्रतीक है, यूएई में इसकी पैठ मध्य पूर्व के विशाल रेमिटेंस बाजार को लक्षित करती है, और मॉरीशस में इसका एकीकरण अफ्रीका के लिए एक डिजिटल वित्तीय पुल बनाता है।
यह सिर्फ एक सुविधा नहीं है, बल्कि भारत की रणनीतिक 'सॉफ्ट पावर' का एक रूप है। यह दुनिया को भारतीय वित्तीय तकनीक से परिचित कराता है और खुदरा स्तर पर रुपये में सीमापार लेनदेन को सामान्य बनाता है। हर बार जब कोई पर्यटक विदेश में यूपीआई का उपयोग करता है, तो वह अनजाने में रुपये की वैश्विक स्वीकार्यता को मजबूत कर रहा होता है।
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