म्यूचुअल फंड निवेश के सबसे पॉपुलर तरीकों में से एक हैं। इसकी वजह ये है कि इनमें निवेश करना आसान होता है। इतना ही नहीं इसमें निवेश की कई स्ट्रैटेजी के ऑप्शन भी मिलते हैं। डाइवर्सिफिकेशन की वजह से रिलेटिव सेफ्टी मिलती है और अलग-अलग सेक्टर और एसेट क्लास में से चुनाव का ऑप्शन भी होता है। ऐसे में बहुत से निवेशकों के पोर्टफोलियो में बहुत ज्यादा म्यूचुअल फंड हो जाते हैं। वैसे भी कभी-कभी रीबैलेंस करने की वजह से बहुत ज्यादा म्यूचुअल फंड स्कीम की बाढ़ आ जाती है। वहीं NFOs को जोड़ने से भी पोर्टफोलियों में स्कीम्स बढ़ जाती हैं।
पोर्टफोलियो ओवरलैप से लगता है झटका
कई बार निवेशक क्वांटिटी को ही क्वालिटी समझ लेते हैं, जिससे उनके पास ओवर इन्वेस्टेड, ओवरलैपिंग पोर्टफोलियो बन जाता है। इससे छिपे हुए खर्च इतना ज्यादा बढ़ जाते हैं कि रिटर्न कम हो जाता है। ऐसे में निवेशकों को कई तरह से नुकसान झेलना पड़ता है। कभी कॉमन स्टॉक्स में गिरावट आती है तो एकसाथ पूरा पोर्टफोलियो धड़ाम हो जाता है, जिससे डाइवर्सिफिकेशन का मतलब ही पूरी तरह से खत्म हो जाता है।
इस मामले में एक्सपर्ट का कहना है कि हर म्यूचुअल फंड में एक्सपेंस रेश्यो चार्ज लगता है, इसलिए जब कई फंड एक ही स्टॉक रखते हैं, तो इन्वेस्टर्स को एक जैसे एक्सपोजर के लिए कई तरह मैनेजमेंट फीस देनी पड़ती हैं। वहीं लॉन्ग टर्म में निवेश कम हो जाता है। ऐसे में डुप्लीकेशन के कारण पोर्टफोलियो-लेवल की लागत बहुत ज्यादा हो सकती है। इस समस्या से निपटने के लिए जानकारों का कहना है कि ओवरलैपिंग स्कीमों को मिलाकर पोर्टफोलियो को आसान बनाने से कुल लागत कम होती है। कुल मिलाकर रिस्क प्रोफाइल में बदलाव किए बिना नेट रिटर्न बेहतर किया जा सकता है।
कैसे पता करें पोर्टफोलियो ओवरलैप है?
1. फैक्टशीट से पहचानें ओवरलैप
इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, अपने म्यूचुअल फंड की मंथली फैक्टशीट देखकर आप ओवरलैप की पहचान कर सकते हैं। इसमें आपको 'टॉप होल्डिंग्स' सेक्शन देखना होगा। अगर आपको हर जगह Reliance Industries, HDFC Bank, या Infosys जैसे एक ही नाम दिखते हैं, तो यह एक रेड फ्लैग है। यह डाइवर्सिफाइड नहीं हैं। आप बस अलग-अलग स्कीम के जरिए एक ही स्टॉक खरीद रहे हैं। अपने सभी फंड्स की फैक्टशीट डाउनलोड करें और उनकी साइड-बाय-साइड तुलना करें। अगर आपको वही कंपनियाँ बार-बार नजर आ रही हैं, तो इसका मतलब है कि ओवरलैप है।
2. डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करें
ओवरलैप की पहचान करने के लिए जेरोधा कॉइन या ग्रोव जैसे प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पोर्टफोलियो एनालिसिस टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। कुछ तो सेक्टर-वाइज़ कंसंट्रेशन भी दिखाते हैं, जिससे आप देख सकते हैं कि आपने बैंकिंग, IT, या किसी दूसरे सेक्टर में बहुत ज्यादा निवेश तो नहीं किया है।
कैसे करें फंड का चयन
जानकारों का कहना है कि हर कैटेगरी में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले और सबसे भरोसेमंद फंड का ही चुनाव करना चाहिए। बाकी को छोड़ देना चाहिए। चार अलग-अलग लार्ज-कैप फंड रखने से ज्यादा वित्तीय सुरक्षा नहीं होती है। शुरुआती दौर में टॉप होल्डिंग्स और सेक्टर वेट्स को मैप करें, फिर कंसिस्टेंसी और कॉस्ट के आधार पर हर कैटेगरी में सिर्फ़ एक मज़बूत फंड रखना चाहिए। वहीं डायवर्सिफिकेशन के लिए अलग-अलग फंड हाउस से खरीदारी करना चाहिए।
बिना टैक्स के झंझट के अपने म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो को कैसे ट्रिम करें?
एक बार जब आप उन फंड्स को पहचान लेते हैं जिन्हें हटाना है, तो आप बिना भारी टैक्स बिल के उनसे बाहर कैसे निकल सकते हैं?
खर्च कम करने के लिए टाइमिंग चेक करें
अगर आप अचानक बाहर निकलते हैं, तो आपको कई अनचाहे खर्च उठाने पड़ सकते हैं। इसलिए, बाहर निकलने का फ़ैसला करने से पहले, यह देखना जरूरी है कि आपको सिर्फ़ बाहर निकलने के समय की वजह से कितना खर्च करना पड़ेगा। सबसे पहले एग्जिट लोड के बारे में पता करें। कई म्यूचुअल फंड अगर आप एक साल के अंदर इन्वेस्टमेंट से बाहर निकलते हैं, तो 1% तक एग्जिट लोड चार्ज करते हैं। अगर हो सके, तो पूरा करना बेहतर है।
LTCG छूट का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाएं
टैक्सेशन के नज़रिए से टाइमिंग भी बहुत जरूरी है। अगर आपका इन्वेस्टमेंट एक साल पूरा हो जाता है, तो आपको इक्विटी MF पर 1.25 लाख रुपये की LTCG छूट मिलेगी और बाकी मुनाफे पर 12.5% की दर से टैक्स देना होगा। वहीं अगर समय से एग्जिट करते हैं, तो आपको 20% का बहुत ज्यादा STCG टैक्स देना पड़ेगा। इसलिए थोड़ा इंतजार करने से आप बड़ी बचत कर सकते हैं।