
EPS 95 Pension: देश के लाखों EPS-95 पेंशनर्स कई साल से मांग कर रहे हैं कि उनकी न्यूनतम पेंशन ₹1,000 से बढ़कर ₹7,500 की जाए। महंगाई बढ़ रही है, दवाइयों से लेकर घर का खर्च सब महंगा हो गया है, लेकिन पेंशन में काफी समय से बढ़ोतरी नहीं की गई है। ऐसे में जब संसद में इस मुद्दे पर फिर से सवाल उठा, तो एक बार फिर उम्मीदें बढ़ गईं कि शायद इस बार सरकार कोई बड़ा फैसला सुना दे। लेकिन केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए।
दरअसल, संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र (Parliament Winter Session) लोकसभा में सांसद बल्या मामा सुरेश गोपीनाथ म्हात्रे ने सरकार से 6 सीधे सवाल पूछे। उन्होंने पूछा कि क्या न्यूनतम पेंशन 7,500 रुपये करने पर सरकार विचार कर रही है? अगर नहीं, तो इसकी वजह क्या है? साथ ही, पेंशनर्स को महंगाई राहत क्यों नहीं दी जाती, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है? क्या सरकार ने पेंशनर्स की समस्याओं पर कोई कदम उठाए हैं और अगर उठाए हैं तो क्या कार्रवाई की गई है?
श्रम और रोजगार राज्य मंत्री शोभा करंदलजे ने संसद में जवाब देते हुए कहा कि फिलहाल मिनिमम पेंशन बढ़ाने के कोई प्रस्ताव पर सरकार विचार नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछली वैल्यूएशन रिपोर्ट (31 मार्च 2019) के आधार पर EPS फंड में भारी एक्चुरियल डेफिसिट (actuarial deficit) है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में पेंशन देने के लिए जितनी रकम की जरूरत होगी, उतनी रकम फंड में जमा नहीं हो पा रही है। सरकार ने यह भी कहा कि अभी 1,000 रुपये की मिनिमम पेंशन (EPS Pension) भी केंद्रीय बजट से मिलने वाले सपोर्ट की बदौलत ही संभव हो पाती है। ऐसे में पेंशन बढ़ाने से फंड पर और दबाव पड़ेगा, जब तक कि कोई नया फंडिंग मॉडल तैयार नहीं किया जाता है।
साल 1995 में शुरू हुई एंप्लॉईज पेंशन स्कीम (Employees’ Pension Scheme - EPS-95) देश की सबसे बड़ी पेंशन योजना है। इस योजना में निजी क्षेत्र और संगठित क्षेत्र के 80 लाख से ज्यादा पेंशनर्स शामिल हैं। इस योजना के तहत पेंशन का पैसा दो तरीकों से दिया जाता है। कर्मचारी के वेतन का 8.33% हिस्सा एंप्लॉयर्स की ओर से कंट्रीब्यूट किया जाता है, जबकि सरकार की ओर से 1.16% का योगदान किया जाता है। ये कंट्रीब्यूशन 15,000 रुपये की वेज-सीलिंग के दायरे में किए जाते हैं। सरकार ने EPS-95 के तहत 1,000 रुपये की मिनिमम पेंशन 2014 में तय की थी। लेकिन समय के साथ महंगाई तेज़ी से बढ़ी, दवाइयों का खर्च बढ़ा और रोजमर्रा की जिंदगी महंगी होती चली गई। पेंशनर्स का कहना है कि 1000 रुपये एक हफ्ते भी नहीं चलते हैं।
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