
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 70% दिव्यांग शादीशुदा बेटी को उसके दिवंगत पिता की फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही उसका पति 100% दिव्यांग हो और सरकारी नौकरी में सालाना 4 लाख रुपए कमाता हो। यह फैसला तब आया जब बेटी ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसने सरकार के पेंशन न देने के निर्णय को सही ठहराया था।
दिवंगत सुरेंद्र पाल सरकारी सेवा से 30 जून, 1999 को सेवानिवृत्त हुए थे और पेंशन उसी समय मंजूर हुई थी। उनके निधन के बाद बेटी ने 2014 में फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया। हालांकि, सरकार ने उसे दिव्यांगता प्रमाणपत्र, कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाणपत्र और पति का आय प्रमाणपत्र जमा करने को कहा। 6 नवंबर 2015 को पेंशन आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। इसके खिलाफ बेटी ने CAT (Central Administrative Tribunal) में अपील की। CAT ने 2 जून 2016 को निर्देश दिए कि आय प्रमाणपत्र जारी किया जाए और पेंशन पर पुनर्विचार किया जाए। पति की आय 4,22,502 रुपए पाई गई, जो निर्धारित सीमा से अधिक थी। इसी आधार पर 8 मई 2017 को पेंशन न देने का आदेश जारी हुआ।
बेटी ने हाईकोर्ट में अपील की और 21 मई 2025 को केस जीत लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाहिता होने के बावजूद, यदि बेटी दिव्यांग है और जीविका कमाने में असमर्थ है, तो उसे जीवन भर पेंशन मिलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि पति की आय को बेटी की पेंशन से जोड़कर निर्णय लेना नियमों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने CAT का आदेश बरकरार रखा और सरकार को पेंशन तत्काल ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष रूप से सक्षम बेटियों का पेंशन अधिकार विवाह या उम्र से प्रभावित नहीं होता। यदि बेटी 25 वर्ष से अधिक की है और दिव्यांग है, तो उसे जीवन भर पेंशन का अधिकार है। सामान्य बेटियों को 25 वर्ष तक पेंशन मिलती है, भले ही वे शादीशुदा हों, जब तक वे अपनी जीविका स्वयं नहीं कमातीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार ने बेटी के पति की आय को उसके पेंशन दावे में शामिल किया, जो गलत था।
यह फैसला बेटियों के अधिकारों के लिए ऐतिहासिक है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी या पति की आय पेंशन देने में बाधा नहीं बन सकती। उच्च न्यायालय का यह निर्णय दिव्यांग बेटियों के अधिकारों की सुरक्षा और समानता की दिशा में मील का पत्थर है। इसके साथ ही इस ऐतिहासिक फैसले से देशभर में हजारों परिवार प्रभावित होंगे और कई पुराने मामलों की समीक्षा भी संभव है।
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