
अगर आप शेयर बाजार में निवेश करते हैं तो जोखिम को कम करने के लिए डाइवर्सिफिकेशन जरूरी है। यानी पैसा सिर्फ बड़ी कंपनियों (लार्ज कैप) में नहीं, बल्कि मिड और स्मॉल कैप में भी होना चाहिए। साल 2025 इसका अच्छा उदाहरण रहा। जहां निफ्टी 50 ने करीब 10 पर्सेंट का रिटर्न दिया। वहीं, निफ्टी मिडकैप 150 सिर्फ 5 पर्सेंट पर सिमट गया। जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 250 में करीब 6 पर्सेंट की गिरावट देखने को मिली। बीते सालों में ये तीनों सेगमेंट बारी-बारी से अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे ऐसा रास्ता चुनें, जिससे जोखिम भी बंटे और लंबे समय में बेहतर, संतुलित रिटर्न मिल सके। यही काम फ्लेक्सी-कैप और मल्टी-कैप म्यूचुअल फंड करते हैं।
फ्लेक्सी-कैप फंड की बात करें तो इसमें फंड मैनेजर को पूरी आजादी होती है कि वह कब लार्ज कैप में ज्यादा पैसा लगाए और कब मिड या स्मॉल कैप में। नियम सिर्फ इतना है कि कम से कम 65 पर्सेंट निवेश इक्विटी में होना चाहिए। हालांकि, कैटेगरी की कोई तय सीमा नहीं है। अगर बाजार में मिड और स्मॉल कैप महंगे लगने लगें, तो फंड मैनेजर वहां से पैसा निकालकर लार्ज कैप में डाल सकता है। वहीं, अगर उसे लगे कि मिड और स्मॉल कैप में आगे ग्रोथ की संभावना है, तो वहां एक्सपोजर बढ़ा सकता है। यानी यह फंड उन निवेशकों के लिए है जो फंड मैनेजर के फैसलों पर भरोसा करते हैं और बाजार के हिसाब से रणनीति बदलने में सहज हैं।
मल्टी-कैप फंड थोड़ा ज्यादा स्ट्रक्चर्ड होता है। इसमें नियम है कि कम से कम 75 पर्सेंट पैसा इक्विटी में लगे। जबकि हर हाल में 25 पर्सेंट लार्ज कैप, 25 पर्सेंट मिड कैप और 25 पर्सेंट स्मॉल कैप में निवेश बना रहे। बचा हुआ 25 पर्सेंट फंड मैनेजर अपनी समझ से कहीं भी लगा सकता है। इसका मतलब यह है कि निवेशक को हर समय तीनों सेगमेंट का एक्सपोजर मिलता रहता है। लार्ज कैप की स्थिरता और मिड-स्मॉल कैप की ग्रोथ, दोनों का फायदा एक साथ।
अब बड़ा सवाल यह है कि कौन-सा फंड चुना जाए? दोनों ही इक्विटी फंड हैं, इसलिए जोखिम ज्यादा है और निवेश का नजरिया कम से कम 5 साल या उससे ज्यादा का होना चाहिए। टैक्स के मामले में भी दोनों का ट्रीटमेंट एक जैसा है। अगर आप चाहते हैं कि फंड मैनेजर बाजार देखकर तेजी से फैसले ले और आप उसे पूरी छूट देने को तैयार हैं, तो फ्लेक्सी-कैप आपके लिए सही हो सकता है। वहीं, जो लोग चाहते हैं कि उनका पोर्टफोलियो हमेशा बैलेंस्ड रहे, उनके लिए मल्टी-कैप एक आसान विकल्प हो सकता है। समझदारी यही है कि अपने जोखिम प्रोफाइल और लक्ष्यों को देखकर फैसला लें और जरूरत हो तो किसी फाइनेंशियल एडवाइजर की मदद जरूर लें।
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